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ऑस्ट्रेलिया में ‘ह्यूमन कंपोस्टिंग’ को कानूनी मंजूरी

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, ::मृत्यु के बाद शरीर का क्या होना चाहिए? सदियों से मानव सभ्यता इस प्रश्न का उत्तर अपनी धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर देती आई है। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में शव को दफनाने या दाह संस्कार के माध्यम से अंतिम विदाई दी जाती है। लेकिन बदलते समय के साथ अंतिम संस्कार के विकल्प भी बदल रहे हैं। इसी क्रम में अब एक ऐसा तरीका चर्चा में है, जो प्रकृति के चक्र में मानव शरीर की वापसी को एक नई दिशा देता है। इसे ‘ह्यूमन कंपोस्टिंग’ कहा जाता है।

ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में मानव शरीर के अंतिम संस्कार की इस नई पद्धति को कानूनी मंजूरी मिलने के बाद पर्यावरण के अनुकूल अंतिम संस्कार के विकल्पों पर बहस तेज हो गई है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में ‘नेचुरल ऑर्गेनिक रिडक्शन’ (एनओआर) और कानूनी संदर्भ में ‘टेरामेशन’ कहा जाता है। इसमें नियंत्रित परिस्थितियों में सूक्ष्मजीवों की सहायता से मृत शरीर को विघटित करके खाद जैसी जैविक सामग्री में बदला जाता है। यह विचार सुनने में कुछ लोगों को असहज लग सकता है, क्योंकि मानव शरीर को लेकर हमारी भावनाएं, धार्मिक आस्थाएं और सामाजिक मान्यताएं गहराई से जुड़ी होती हैं। फिर भी, इस नई तकनीक ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है कि क्या मृत्यु के बाद शरीर को प्रकृति में लौटाने का अधिक पर्यावरण-अनुकूल तरीका अपनाया जा सकता है?

प्रकृति में जन्म, जीवन, मृत्यु और पुनर्चक्रण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पेड़-पौधों की पत्तियां गिरती हैं, जीव-जंतु मरते हैं और उनके जैविक अवशेष धीरे-धीरे विघटित होकर मिट्टी का हिस्सा बन जाते हैं। इस प्रक्रिया में बैक्टीरिया, फफूंद और अन्य सूक्ष्मजीव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में छोटे जीव भी अपघटन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं। मानव शरीर भी जैविक पदार्थों से बना है। मृत्यु के बाद शरीर की कोशिकाओं और ऊतकों में परिवर्तन शुरू हो जाते हैं। इसके बाद विभिन्न सूक्ष्मजीव और पर्यावरणीय परिस्थितियां अपघटन की गति को प्रभावित करती हैं। सामान्य परिस्थितियों में यह प्रक्रिया कई महीनों से लेकर वर्षों तक चल सकती है। इसमें मिट्टी की प्रकृति, नमी, तापमान, ऑक्सीजन की उपलब्धता और शव को रखने के तरीके की अहम भूमिका होती है।

ह्यूमन कंपोस्टिंग इसी प्राकृतिक प्रक्रिया को नियंत्रित वातावरण में तेज करने का प्रयास है। इसका उद्देश्य शरीर के जैविक अवशेषों को अपेक्षाकृत कम समय में स्थिर पदार्थ में बदलना है। इस प्रक्रिया में लकड़ी के छोटे टुकड़े, सूखा भूसा और अन्य जैविक सामग्री का उपयोग किया जाता है। सही मात्रा में नमी, हवा और तापमान उपलब्ध कराकर सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को अनुकूल बनाया जाता है। इस तरह विज्ञान प्रकृति की किसी नई प्रक्रिया का आविष्कार नहीं करता, बल्कि पहले से मौजूद जैविक प्रक्रिया को नियंत्रित और व्यवस्थित रूप में उपयोग करने की कोशिश करता है।

ह्यूमन कंपोस्टिंग की प्रक्रिया विशेष रूप से तैयार किए गए पात्रों या कक्षों में संपन्न होती है। इसमें शव को प्राकृतिक कफन में लपेटकर लकड़ी के टुकड़ों, सूखे भूसे और अन्य उपयुक्त जैविक पदार्थों के साथ रखा जाता है। कुछ प्रणालियों में अल्फाल्फा जैसी वनस्पतियों का भी उपयोग किया जाता है। इसके बाद पात्र के भीतर तापमान, नमी और हवा के प्रवाह को नियंत्रित किया जाता है। लगभग 55 से 70 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान कुछ प्रणालियों में जैविक अपघटन को गति देने में मदद करता है। हालांकि, वास्तविक तापमान और प्रक्रिया की अवधि संबंधित तकनीक तथा संचालन व्यवस्था पर निर्भर करती है। इस दौरान सूक्ष्मजीव शरीर के नरम ऊतकों और अन्य जैविक पदार्थों को विघटित करते हैं। जैविक सामग्री के उचित मिश्रण से हवा का प्रवाह बना रहता है, जिससे अपघटन की प्रक्रिया प्रभावी ढंग से आगे बढ़ती है। नियंत्रित तापमान रोग पैदा करने वाले कई सूक्ष्मजीवों को निष्क्रिय करने में भी सहायक हो सकता है, लेकिन सुरक्षित अंतिम उत्पाद सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित मानकों और परीक्षणों का पालन आवश्यक है।

आमतौर पर इस प्रक्रिया में लगभग दो से तीन महीने लग सकते हैं। इसके बाद एक ऐसा पदार्थ प्राप्त होता है, जो देखने और बनावट में मिट्टी या खाद जैसा हो सकता है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि हर शव ठीक दो-तीन महीने में पूरी तरह खाद बन जाएगा। समय का निर्धारण तकनीक, पर्यावरणीय परिस्थितियों और जैविक सामग्री के आधार पर होता है। प्रक्रिया के बाद हड्डियों के शेष टुकड़ों को अलग किया जा सकता है। उन्हें विशेष उपकरणों से संसाधित करके निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार वापस जैविक सामग्री में मिलाया जा सकता है। दांतों, कृत्रिम जोड़ों, धातु के प्रत्यारोपण और अन्य गैर-जैविक वस्तुओं को अलग करना पड़ सकता है। अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उसकी उचित जांच भी महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, ह्यूमन कंपोस्टिंग केवल शव को किसी पात्र में रख देने की प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए प्रशिक्षित कर्मियों, नियंत्रित वातावरण, वैज्ञानिक निगरानी और स्पष्ट कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता होती है।

पारंपरिक दफन संस्कार में शव को मिट्टी के भीतर रखा जाता है। इसके बाद शरीर का विघटन धीरे-धीरे होता है। इसकी गति कई कारकों पर निर्भर करती है। मिट्टी में नमी, तापमान, ऑक्सीजन, मिट्टी की बनावट और शव को सुरक्षित रखने के लिए अपनाए गए उपाय इस प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। रेतीली या बजरी वाली मिट्टी में, यदि परिस्थितियां अनुकूल हों, तो अपघटन अपेक्षाकृत तेजी से हो सकता है। दूसरी ओर, ठंडे, कम ऑक्सीजन वाले या विशेष प्रकार की कब्रों में यह प्रक्रिया बहुत धीमी हो सकती है। बंद पत्थर की कब्र या अन्य सीमित वातावरण में शरीर के पूरी तरह कंकाल बनने में कई दशक भी लग सकते हैं। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि हर दफनाए गए शव को कंकाल बनने में एक निश्चित अवधि लगती है। इसी तरह, ह्यूमन कंपोस्टिंग की अवधि भी हर परिस्थिति में समान नहीं होती। फिर भी, नियंत्रित तापमान और नमी के कारण ह्यूमन कंपोस्टिंग में जैविक पदार्थों का विघटन पारंपरिक दफन की तुलना में कम समय में पूरा किया जा सकता है। यही इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है।

दाह संस्कार भारत सहित कई देशों में प्रचलित अंतिम संस्कार की एक प्रमुख परंपरा है। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से इसका विशेष महत्व है। पारंपरिक लकड़ी आधारित दाह संस्कार में बड़ी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता हो सकती है और दहन के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड सहित विभिन्न गैसें उत्सर्जित होती हैं। वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव लकड़ी के स्रोत, दहन की दक्षता और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। विद्युत और गैस आधारित शवदाह गृहों में लकड़ी की जरूरत कम हो जाती है, लेकिन उनके संचालन में बिजली या ईंधन की खपत होती है। इसलिए इन प्रणालियों के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन ऊर्जा के स्रोत और पूरी प्रक्रिया को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

दूसरी ओर, पारंपरिक दफन में भूमि की आवश्यकता होती है। बड़े शहरों में कब्रिस्तानों के लिए उपयुक्त जमीन की उपलब्धता लगातार एक चुनौती बन सकती है। कुछ स्थानों पर ताबूत बनाने में लकड़ी और धातु का उपयोग किया जाता है। शव संरक्षण के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायनों और ताबूतों में मौजूद प्लास्टिक जैसी सामग्रियों को लेकर भी पर्यावरणीय चिंताएं उठाई जाती रही है। ह्यूमन कंपोस्टिंग के समर्थकों का तर्क है कि इससे लकड़ी, ईंधन और भूमि की जरूरत कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसे हर परिस्थिति में पारंपरिक तरीकों से बेहतर मान लेना जल्दबाजी होगी। इसके लिए ऊर्जा की खपत, परिवहन, उपकरणों के निर्माण, प्रक्रिया के उत्सर्जन और अंतिम उत्पाद के उपयोग सहित पूरे जीवन-चक्र का वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है।

ह्यूमन कंपोस्टिंग को आधुनिक अंतिम संस्कार के विकल्प के रूप में लोकप्रिय बनाने में अमेरिका की कैटरीना स्पेड की पहल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने मानव शरीर के प्राकृतिक अपघटन को नियंत्रित प्रक्रिया के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया। इसके बाद अमेरिका के कई राज्यों में इस पद्धति को कानूनी मान्यता मिली। अमेरिका में इसकी अनुमति राज्यवार कानूनों के आधार पर दी जाती है। अलग-अलग राज्यों में इसकी उपलब्धता, नियमन और संचालन की शर्तें अलग हो सकती हैं। इसलिए इसे पूरे अमेरिका में एक समान रूप से उपलब्ध विकल्प मानना उचित नहीं होगा।

अब ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में इसे कानूनी मान्यता मिलने से इस विषय पर चर्चा का नया दौर शुरू हुआ है। कानूनी मंजूरी का अर्थ यह नहीं है कि अगले दिन से हर शहर में ऐसी सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। इसके लिए उपयुक्त केंद्रों की स्थापना, तकनीकी मानकों का निर्धारण, कर्मचारियों का प्रशिक्षण, संचालन की निगरानी और आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होगी। इस व्यवस्था के तहत वास्तविक सेवाएं शुरू होने में समय लग सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में ऐसी सुविधाओं की शुरुआत 2029 से पहले होने की संभावना नहीं बताई गई है। इस समयसीमा को संभावित अनुमान के रूप में देखना चाहिए, न कि निश्चित तारीख के रूप में।

ह्यूमन कंपोस्टिंग के बारे में सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर होती है कि अंत में प्राप्त पदार्थ को मिट्टी में मिलाया जा सकता है। इस पदार्थ में जैविक तत्व और कुछ पोषक घटक मौजूद हो सकते हैं। लेकिन इसे सामान्य बाजार में मिलने वाली बगीचे की खाद के समान मान लेना सही नहीं होगा। मानव शरीर से प्राप्त जैविक पदार्थ का उपयोग कहां और किस प्रकार किया जा सकता है, यह स्थानीय कानूनों, पर्यावरणीय मानकों और सुरक्षा परीक्षणों पर निर्भर करता है। इसमें संभावित रोगजनकों, रासायनिक अवशेषों और अन्य संदूषकों का आकलन महत्वपूर्ण है। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि ऐसी प्रक्रिया से प्राप्त हर पदार्थ का उपयोग खाद्य फसलों, घरेलू बगीचों या सार्वजनिक हरित क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से किया जा सके। कुछ क्षेत्रों में इसके उपयोग पर विशेष शर्तें या प्रतिबंध लागू हो सकते हैं। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मानव शरीर से प्राप्त पदार्थ को पर्यावरण में लौटाने से पहले उसकी सुरक्षा और उपयुक्तता सुनिश्चित की जाए। प्रकृति के चक्र में शामिल होने का विचार तभी सार्थक होगा, जब उससे मिट्टी, पानी, पौधों और मानव स्वास्थ्य को अनावश्यक जोखिम न हो।

मृत्यु के बाद शरीर के साथ क्या किया जाए, यह केवल वैज्ञानिक या पर्यावरणीय प्रश्न नहीं है। इसके साथ मनुष्य की धार्मिक आस्था, पारिवारिक परंपरा, व्यक्तिगत इच्छा और सामाजिक भावनाएं भी जुड़ी हुई है। हिन्दू परंपरा में दाह संस्कार का विशेष महत्व है। अनेक परिवार इसे आत्मा की यात्रा और शरीर के पंचतत्त्व में विलीन होने की मान्यता से जोड़ते हैं। दूसरी ओर, विभिन्न धर्मों और समुदायों में दफनाने की परंपरा प्रचलित है। इन परंपराओं के पीछे केवल व्यावहारिक कारण नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अर्थ भी है। ऐसे में ह्यूमन कंपोस्टिंग को सभी लोगों के लिए उपयुक्त विकल्प नहीं माना जा सकता। कुछ लोग इसे प्रकृति में शरीर की वापसी का एक नया माध्यम समझ सकते हैं, जबकि अन्य इसे अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं पाएंगे।

लोकतांत्रिक समाज में किसी व्यक्ति की अंतिम इच्छा, परिवार की भावनाओं और धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान आवश्यक है। यदि कोई देश इस तरह की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता देता है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि व्यक्ति को विकल्प चुनने की स्वतंत्रता मिले और किसी पर इसे अपनाने का दबाव न हो। कानूनी मान्यता का अर्थ किसी पुरानी परंपरा को समाप्त करना नहीं, बल्कि निर्धारित शर्तों के तहत एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराना है।

दुनिया की बढ़ती आबादी, शहरों का विस्तार, जमीन की सीमित उपलब्धता और पर्यावरणीय चिंताओं के बीच अंतिम संस्कार के वैकल्पिक तरीकों पर विचार करना स्वाभाविक है। ह्यूमन कंपोस्टिंग इसी बदलते दृष्टिकोण का एक उदाहरण है। इसके संभावित लाभों में नियंत्रित वातावरण में तेज जैविक अपघटन, कुछ परिस्थितियों में भूमि और पारंपरिक ईंधन की जरूरत कम करने की संभावना तथा शरीर के जैविक तत्वों को प्रकृति में लौटाने का विचार शामिल है। लेकिन इसके साथ कई सवाल भी जुड़े हैं।

इस प्रक्रिया की वास्तविक पर्यावरणीय बचत कितनी है? इसके लिए कितनी ऊर्जा की जरूरत होती है? अंतिम उत्पाद की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी? इससे जुड़ी सुविधाओं की लागत कितनी होगी? क्या यह विकल्प आम लोगों के लिए आर्थिक रूप से सुलभ होगा? और अलग-अलग धार्मिक समुदाय इसे किस तरह स्वीकार करेंगे? इन प्रश्नों के उत्तर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन, स्पष्ट कानूनी नियमों और सामाजिक संवाद से ही मिल सकते हैं। किसी नई तकनीक के प्रचार के आधार पर उसे तत्काल सबसे अच्छा विकल्प घोषित करना उचित नहीं होगा। इसके अतिरिक्त, शवों के सम्मानजनक प्रबंधन, परिवार की सहमति, व्यक्तिगत इच्छा के दस्तावेजीकरण और प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे विषयों पर भी स्पष्ट नियम होने चाहिए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर मृत व्यक्ति की गरिमा से कोई समझौता न हो।

ह्यूमन कंपोस्टिंग मानव जीवन और प्रकृति के संबंध को एक नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर देती है। यह बताती है कि आधुनिक विज्ञान प्राकृतिक अपघटन की प्रक्रिया को समझकर उसे व्यवस्थित रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास कर रहा है। लेकिन विज्ञान की किसी भी नई उपलब्धि की तरह इसका मूल्यांकन भी तथ्यों, सुरक्षा, पर्यावरणीय प्रभाव और सामाजिक स्वीकार्यता के आधार पर होना चाहिए। मृत्यु जीवन का अंतिम पड़ाव है, लेकिन प्रकृति में पदार्थों का चक्र लगातार चलता रहता है। शरीर मिट्टी में लौटे, अग्नि के माध्यम से परिवर्तित हो या किसी अन्य कानूनी और सुरक्षित पद्धति से उसका अंतिम संस्कार हो, हर समाज ने इस विषय को अपने सांस्कृतिक अनुभवों और मान्यताओं के आधार पर समझा है।

ऑस्ट्रेलिया में ह्यूमन कंपोस्टिंग को मिली कानूनी मंजूरी इस बहस को नई दिशा देती है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि यह विकल्प कितना व्यावहारिक, सुरक्षित और पर्यावरण के लिए लाभकारी सिद्ध होता है। अंततः किसी भी अंतिम संस्कार पद्धति की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि शरीर कितनी जल्दी विघटित होता है। उसकी सफलता इस बात में भी निहित है कि वह मृत व्यक्ति की गरिमा, परिवार की भावनाओं, धार्मिक स्वतंत्रता और पर्यावरणीय सुरक्षा का कितना सम्मान करती है। विज्ञान विकल्प उपलब्ध करा सकता है, लेकिन उन विकल्पों में से चयन समाज को अपनी संवेदनशीलता, विवेक और जिम्मेदारी के साथ करना होगा।

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