*धनत्रयोदशी के दिन किए जानेवाले यमदीपदान और स्वर्ण अथवा चांदी के नए पात्र क्रय करने का शास्त्र*

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी अर्थात `धनत्रयोदशी’ । इसी को साधारण बोलचाल की भाषा में `धनतेरस’ कहते हैं । इस दिन के विशेष महत्त्व का कारण यह दिन देवताओं के वैद्य धन्वंतरि की जयंती का दिन है ।
*धनत्रयोदशी के दिन यमदीपदान करने का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व*
*अ. दीपदान से दीर्घ आयु की प्राप्ति होना* – दीप प्राणशक्ति एवं तेजस्वरूप शक्ति प्रदान करता है । दीपदान करने से व्यक्ति को तेज की प्राप्ति होती है । इस से उस की प्राणशक्ति में वृद्धि होती है और उ से दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है ।
*आ. यमदेव के आशीर्वाद प्राप्त करना* – धनत्रयोदशी के दिन ब्रह्मांड में यमतरंगों के प्रवाह कार्यरत रहते हैं । इसलिए इस दिन यमदेवता से संबंधित सर्व विधियों के फलित होने की मात्रा अन्य दिनों की तुलना में ३० प्रतिशत अधिक होती है । धनत्रयोदशी के दिन संकल्प कर यमदेव के लिए दीप का दान करते हैं और उन के आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ।
*इ. यमदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना* – यमदेव मृत्युलोक के अधिपति हैं । धनत्रयोदशी के दिन यमदेव का नरकपर आधिपत्य होता है । साथही विविध लोकों में होनेवाले अनिष्ट शक्तियों के संचारपर भी उन का नियंत्रण रहता है । धनत्रयोदशी के दिन यमदेव से प्रक्षेपित तरंगें विविध नरकोंतक पहुंचती हैं । इसी कारण धनत्रयोदशी के दिन नरक में विद्यमान अनिष्ट शक्तियोंद्वारा प्रक्षेपित तरंगें संयमित रहती हैं । परिणामस्वरूप पृथ्वीपर भी नरकतरंगों की मात्रा घटती है । इसीलिए धनत्रयोदशी के दिन यमदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उन का भावसहित पूजन एवं दीपदान करते हैं । दीपदान से यमदेव प्रसन्न होते हैं ।
संक्षेप में कहें तो, यमदीपदान करना अर्थात दीप के माध्यम से यमदेव को प्रसन्न कर अपमृत्यु के लिए कारणभूत कष्टदायक तरंगों से रक्षा के लिए उनसे प्रार्थना करना ।
*यमदीपदान की विधि हेतु आवश्यक सामग्री आर महत्त्व*
यमदीपदान विधि में नित्य पूजा की थाली में घिसा हुआ चंदन, पुष्प, हलदी, कुमकुम, अक्षत अर्थात अखंड चावल इत्यादि पूजासामग्री होनी चाहिए । साथही आचमन के लिए ताम्रपात्र, पंचपात्र, आचमनी ये वस्तुएं भी आवश्यक होती हैं । यमदीपदान करने के लिए हलदी मिलाकर गुंदे हुए गेहूं के आटे से बने विशेष दीप का उपयोग करते हैं ।
*पूजित दीप घर के बाहर दक्षिण दिशा में रखने के परिणाम*
दक्षिण दिशा यमतरंगों के लिए पोषक होती है अर्थात दक्षिण दिशा से यमतरंगें अधिक मात्रा में आकृष्ट एवं प्रक्षेपित होती हैं ।
दक्षिण दिशा से यमतरंगों का प्रवाह दीप की ओर आकृष्ट होता है । यमतरंगों का यह प्रवाह दीप के चारों ओर वलयांकित रूप में फैलता है । यमतरंगों के कारण कनिष्ठ प्रकार की अनिष्ट शक्तियां दूर हट जाती हैं । यमतरंगों के रूप में आए यमदेव के दर्शन हेतु स्थानदेवता एवं वास्तुदेवता भी तत्त्वरूप में उस स्थानपर आते हैं । इन देवताओं के आगमन के कारण वायुमंडल चैतन्यमय बनता है । वास्तु में रहनेवाले सभी सदस्यों को इस का लाभ होता है ।
इस प्रकार यमतरंगों के निकट आने के कारण धनत्रयोदशी के दिन दीप का पूजन कर उस का यमदेव के लिए किया दान उन्हें अल्पावधि में एवं सहजता से प्राप्त होता है । परिणामस्वरूप अपमृत्यु के लिए कारणभूत तरंगों से व्यक्ति की रक्षा होती है ।
*धनत्रयोदशी के दिन स्वर्ण अथवा चांदी के नए पात्र क्रय करने का शास्त्रीय कारण*
धनत्रयोदशी के दिन लक्ष्मीतत्त्व कार्यरत रहता है । इस दिन स्वर्ण अथवा चांदी के नए पात्र क्रय करने की कृतिद्वारा श्री लक्ष्मी के धनरूपी स्वरूप का आवाहन किया जाता है और कार्यरत लक्ष्मीतत्त्व को गति प्रदान की जाती है । इस से द्रव्य कोष में धनसंचय होने में सहायता मिलती है ।
यहां ध्यान रखनेयोग्य बात यह है कि, धनत्रयोदशी के दिन अपनी संपत्ति का लेखा-जोखा कर शेष संपत्ति ईश्वरीय अर्थात सत्कार्य के लिए अर्पित करने से धनलक्ष्मी अंततक रहती है ।


