ताजा खबर

*सोशल मीडिया के यौवनकाल में घटती संवेदनशीलता – कानून का डर नहीं, संस्कारों की ताकत चाहिए*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा,  ::जुर्म हो या गुनाह, अनैतिक हो या अनुचित, अधर्म हो या अशिष्टता, इन पर लगाम लगाने के लिए कानून का डर जरूरी है। कानून व्यवस्था समाज की वह सीमा-रेखा है, जिसे पार करने पर दंड का प्रावधान व्यक्ति को रोकता है। लेकिन क्या केवल कानून के डर से समाज पूरी तरह संवेदनशील, सभ्य और मानवीय बन सकता है? शायद नहीं। कानून अपराध करने के बाद सक्रिय होता है, जबकि संस्कार अपराध करने से पहले व्यक्ति के भीतर एक अदृश्य प्रहरी खड़ा करते हैं। यही अंतर कानून और संस्कार के बीच है। कानून कहता है कि “यह मत करो, वरना दंड मिलेगा।” संस्कार कहते हैं कि “यह मत करो, क्योंकि इससे किसी दूसरे मनुष्य को पीड़ा होगी।” आज जब सोशल मीडिया अपने यौवनकाल में है और हाथों में मौजूद मोबाइल फोन कैमरा, मंच, प्रकाशन माध्यम और दर्शक, सब कुछ एक साथ बन चुका है, तब यह प्रश्न और गंभीर हो गया है कि समाज में असंवेदनशीलता इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है। अब किसी विचार, घटना, तस्वीर या वीडियो को लोगों तक पहुंचाने के लिए बड़े मीडिया संस्थान की आवश्यकता नहीं है। एक मोबाइल फोन और इंटरनेट कनेक्शन पर्याप्त है। यह परिवर्तन अपने साथ अनेक सकारात्मक संभावनाएं लेकर आया है। लेकिन इसके साथ एक दूसरी प्रवृत्ति भी मजबूत हुई है, हर घटना को कंटेंट में बदल देने की प्रवृत्ति। किसी के दुख में संवेदना खोजने के बजाय उसमें वायरल होने की संभावना खोजी जाने लगी है। दुर्घटना हो, विवाद हो, किसी की व्यक्तिगत परेशानी हो या कोई सामाजिक त्रासदी, कभी-कभी कैमरा मदद के लिए आगे बढ़ने से पहले रिकॉर्डिंग शुरू कर देता है। यहीं से संवेदनशीलता का संकट दिखाई देता है। जिस घटना पर समाज को कुछ क्षण रुककर पीड़ित के साथ खड़ा होना चाहिए, वही घटना मनोरंजन का साधन बन जाती है। दर्शक बढ़ते हैं, लाइक बढ़ते हैं, शेयर बढ़ते हैं और फिर उस सामग्री का मूल्य मानवीय पीड़ा से नहीं, उसकी वायरल क्षमता से तय होने लगता है। यह केवल तकनीकी समस्या नहीं है। यह मानसिकता का प्रश्न है।

क्या इसकी वजह कानून की कमजोरी है? क्या व्यक्ति में संस्कारों की कमी है? क्या प्रसिद्धि पाने की होड़ में कंटेंट बनाने की मानसिकता इसके लिए जिम्मेदार है? क्या स्वतंत्र सोच के बीच कहीं दबे हुए रूढ़िवादी विचार इसका कारण हैं? या फिर यह उस मनोवृत्ति का परिणाम है, जो अपनी पहचान और अस्तित्व को लगातार साबित करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार रहती है? इनमें से किसी एक कारण को पूरी समस्या का उत्तर मानना कठिन है। वास्तविकता शायद इन सभी कारणों के सामूहिक मिश्रण में छिपी है। तकनीक ने व्यक्ति को अभिव्यक्ति की शक्ति दी है, लेकिन हर शक्ति के साथ विवेक भी आवश्यक होता है। यदि शक्ति बढ़ जाए और विवेक कमजोर हो जाए, तो वही शक्ति समाज के लिए संकट बन सकती है।

सभ्य समाज में कानून की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है। कानून अपराध को परिभाषित करता है, अपराधी के लिए दंड तय करता है और पीड़ित को न्याय दिलाने की व्यवस्था करता है। इसलिए अपराध पर लगाम लगाने के लिए कठोर और प्रभावी कानून आवश्यक है। कानून का निष्पक्ष पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लेकिन कानून की भी अपनी सीमा है। हर व्यक्ति के पीछे पुलिसकर्मी नहीं खड़ा हो सकता है। हर मोबाइल स्क्रीन पर निगरानी नहीं रखी जा सकती है। हर शब्द, हर तस्वीर और हर वीडियो को प्रकाशित होने से पहले किसी सरकारी संस्था द्वारा जांचना संभव नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून व्यक्ति के भीतर नैतिक विवेक पैदा नहीं कर सकता है। कानून किसी को चोरी करने से रोक सकता है, लेकिन ईमानदार बनने की प्रेरणा नहीं दे सकता है। कानून किसी को हिंसा से रोक सकता है, लेकिन करुणा पैदा नहीं कर सकता है। कानून अश्लील या आपत्तिजनक व्यवहार पर कार्रवाई कर सकता है, लेकिन सम्मान की भावना भीतर से पैदा करनी पड़ती है। यहीं संस्कार की भूमिका शुरू होती है।

संस्कार को केवल धार्मिक कर्मकांड या परंपरा से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। संस्कार का व्यापक अर्थ है व्यक्ति के भीतर सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता, दूसरों के सम्मान की भावना, अपने आचरण के परिणामों को समझने का विवेक और गलत अवसर मिलने पर भी गलत काम न करने का आत्मसंयम। संस्कार वास्तव में मनुष्य के भीतर का अदृश्य कानून है। बाहरी कानून पुलिस, न्यायालय और दंड के माध्यम से काम करता है। संस्कार अंतरात्मा के माध्यम से। बाहरी कानून कहता है कि “पकड़े जाओगे।” संस्कार कहते हैं कि “कोई देखे या न देखे, गलत मत करो।” यही अंतर समाज के चरित्र को निर्धारित करता है।

संस्कारों की पहली पाठशाला परिवार है। बच्चा किताबों से पहले व्यवहार सीखता है। वह माता-पिता को देखकर समझता है कि कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना है, बुजुर्गों का सम्मान कैसे करना है, किसी के दुख में कैसे खड़ा होना है और अपनी इच्छा पूरी न होने पर प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए। यदि घर में सफलता को ही जीवन का सबसे बड़ा मूल्य बना दिया जाए और संवेदना, संयम तथा सम्मान को गौण कर दिया जाए, तो बच्चा अनजाने में यही सीखता है कि परिणाम महत्वपूर्ण है, रास्ता नहीं। आज बच्चों के हाथ में मोबाइल अपेक्षाकृत कम उम्र में पहुंच गया है। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होता है कि बच्चा क्या देख रहा है। यह भी देखना होगा कि वह जो देख रहा है, उसके प्रभाव को कैसे समझ रहा है। डिजिटल दुनिया में माता-पिता का मार्गदर्शन नियंत्रण से अधिक संवाद का विषय होना चाहिए।

संस्कार केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं है। विद्यालय, समाज, मित्र समूह और सार्वजनिक वातावरण भी व्यक्ति के चरित्र को प्रभावित करते हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं हो सकता है। यदि शिक्षित व्यक्ति दूसरों के सम्मान, अधिकार और पीड़ा को समझने में असफल है, तो शिक्षा अधूरी है। विद्यालयों में डिजिटल नागरिकता, सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग, निजता, सहमति, साइबर शिष्टाचार और ऑनलाइन व्यवहार जैसे विषयों पर व्यावहारिक शिक्षा की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि किसी घटना को रिकॉर्ड कर लेना और उसे सार्वजनिक कर देना दो अलग बातें हैं। हर चीज जिसे रिकॉर्ड किया जा सकता है, उसे साझा करना आवश्यक नहीं है।

सोशल मीडिया ने प्रसिद्धि को बहुत आसान बना दिया है। पहले सार्वजनिक पहचान बनाने में वर्षों लग सकते थे। आज कुछ घंटे में कोई वीडियो लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। यही संभावना कई बार व्यक्ति को सीमा लांघने के लिए प्रेरित करती है। कंटेंट बनाने में मौलिकता और रचनात्मकता अच्छी बात है, लेकिन यदि किसी दूसरे की पीड़ा को मनोरंजन में बदलकर प्रसिद्धि हासिल की जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि हम किस कीमत पर लोकप्रिय हो रहे हैं? वायरल होना उपलब्धि हो सकता है, लेकिन हर वायरल चीज मूल्यवान नहीं होती। लाइक की संख्या संवेदना का प्रमाण नहीं है। व्यूज की संख्या विवेक का प्रमाण नहीं है। फॉलोअर्स की संख्या चरित्र का प्रमाण नहीं है। समाज को यह अंतर समझना होगा।

आज की पीढ़ी अधिक स्वतंत्र है। विचारों की अभिव्यक्ति के अवसर पहले से कहीं अधिक हैं। यह लोकतांत्रिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति अपने व्यवहार के सामाजिक परिणामों से मुक्त हो जाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। अपनी बात कहने का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है यह समझना कि हमारी बात किसी दूसरे की गरिमा को अनावश्यक रूप से चोट तो नहीं पहुंचा रही है। परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन भी इसी विवेक से बनता है। हर पुरानी बात सही नहीं होती और हर नई बात गलत नहीं होती है। आवश्यकता इस बात की है कि हम तर्क, संवेदना और मानवीय गरिमा के आधार पर अपना व्यवहार तय करें।

आज इंटरनेट तेज है। आने वाले वर्षों में इसकी गति और बढ़ेगी। कैमरे अधिक शक्तिशाली होंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तस्वीर और वीडियो बनाना आसान होगा। किसी घटना को रिकॉर्ड करना, संपादित करना और दुनिया तक पहुंचाना कुछ सेकंड का काम रह जाएगा। ऐसे समय में असली चुनौती तकनीक नहीं, तकनीक का इस्तेमाल करने वाले मनुष्य की मानसिकता होगी। यदि तकनीक की गति बढ़ती गई और संस्कार वहीं खड़े रहे, तो समस्या और गंभीर हो सकती है। कल्पना कीजिए कि एक दशक बाद आज से कई गुना तेज इंटरनेट हो, बिजली से तेज नजर रखने वाले कैमरे हो, कृत्रिम बुद्धिमत्ता हर दृश्य को समझने और बदलने में सक्षम हो और हर व्यक्ति के हाथ में प्रसारण का माध्यम हो। तब यदि सामाजिक संवेदनशीलता कमजोर रही, तो छोटी-सी असंवेदनशीलता भी देखते-देखते वैश्विक तमाशा बन सकती है। सोशल मीडिया की यह सुनामी किसी एक व्यक्ति को नहीं छोड़ेगी। आज हम किसी दूसरे की पीड़ा को कंटेंट बनाकर देख रहे हैं, कल वही व्यवस्था हमारी निजी पीड़ा को भी सार्वजनिक मनोरंजन में बदल सकती है। इसलिए संवेदनशीलता केवल दूसरों के लिए नहीं है, बल्कि अपने भविष्य के लिए भी जरूरी है।

अपराध हो जाने के बाद कार्रवाई जरूरी है। पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए और अपराधी को कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए। लेकिन क्या हमारी पूरी ऊर्जा केवल घटना के बाद प्रतिक्रिया देने में खर्च होनी चाहिए? शायद इससे बेहतर रास्ता यह है कि समाज अपराध और असंवेदनशीलता के बीजों को पहले ही कमजोर करे। बच्चों में करुणा का संस्कार हो। युवाओं में आत्मसंयम हो। परिवारों में संवाद हो। विद्यालयों में चरित्र और डिजिटल जिम्मेदारी पर चर्चा हो। समाज में अच्छे व्यवहार को सम्मान मिले। सोशल मीडिया पर भी जिम्मेदार अभिव्यक्ति को प्रोत्साहन मिले। संस्कारों में निवेश तत्काल दिखाई नहीं देता है, लेकिन उसका परिणाम पीढ़ियों तक दिखाई दे सकता है।

समाज को कानून चाहिए, लेकिन केवल कानून पर्याप्त नहीं है। हमें पुलिस चाहिए, लेकिन हर क्षण पुलिस की मौजूदगी संभव नहीं है। हमें न्यायालय चाहिए, लेकिन हर अनुचित व्यवहार न्यायालय तक नहीं पहुंच सकता है। इसलिए मनुष्य के भीतर एक ऐसा प्रहरी होना चाहिए जो उसे गलत काम करने से पहले रोक सके। वह प्रहरी है “संस्कार”। कानून अपराध पर लगाम लगा सकता है। संस्कार अपराध की संभावना को कम कर सकते हैं। कानून व्यवस्था बनाए रख सकता है। संस्कार समाज को मानवीय बनाए रख सकते हैं। कानून दंड देता है। संस्कार विवेक देते हैं। इसलिए आज आवश्यकता कानून को कमजोर करने की नहीं, बल्कि कानून के साथ संस्कार को मजबूत करने की है।

हमें तय करना होगा कि हम आने वाली पीढ़ी को केवल तेज इंटरनेट देना चाहते हैं या संवेदनशील मन भी। हम उसे अत्याधुनिक कैमरा देना चाहते हैं या कैमरे का जिम्मेदार उपयोग करने का विवेक भी? हम उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देना चाहते हैं या दूसरों की गरिमा का सम्मान करने की शिक्षा भी? हम उसे प्रसिद्धि की दौड़ में आगे बढ़ाना चाहते हैं या यह भी सिखाना चाहते हैं कि हर कीमत पर प्रसिद्ध होना उपलब्धि नहीं है? इन प्रश्नों के उत्तर ही हमारे सामाजिक भविष्य की दिशा तय करेंगे। अंततः किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल इस बात से नहीं होती है कि उसके कानून कितने कठोर है। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि उसके नागरिक कानून की निगरानी के बिना भी कितना सही आचरण करते हैं। कानून का डर जरूरी है, क्योंकि वह अपराध पर तत्काल लगाम लगाता है। लेकिन इंसानियत जरूरी है, क्योंकि वही मनुष्य को अपराध करने से पहले रोकती है और इंसानियत की जननी संस्कार हैं।

आज यदि हम संस्कारों को मजबूत नहीं करेंगे, तो तकनीक की बढ़ती रफ्तार हमारे सामाजिक विवेक से बहुत आगे निकल जाएगी। फिर हमारे पास तेज इंटरनेट होगा, अत्याधुनिक कैमरे होंगे, अनगिनत मंच होंगे, लेकिन शायद एक-दूसरे के दर्द को समझने वाला मन कम होता जाएगा। इसलिए समय की पुकार केवल यह नहीं है कि अपराधियों पर कानून का शिकंजा मजबूत हो। समय की पुकार यह भी है कि हर घर, हर विद्यालय और हर समाज में संवेदना का दीपक जलाया जाए। क्योंकि कानून अपराधी को रोक सकता है, लेकिन संस्कार मनुष्य को अपराधी बनने से रोकने की शक्ति रखते हैं और भविष्य का सुरक्षित समाज केवल मजबूत कानूनों से नहीं, बल्कि मजबूत चरित्रों से बनेगा।
—————-

Related Articles

Back to top button