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बारूद के साये में पश्चिम एशिया: क्या वैश्विक टकराव का अगला अध्याय लिख रहा है इतिहास: चौरसिया

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/भारत की कूटनीतिक संतुलन नीति पर बढ़ी परीक्षा, ऊर्जा और अर्थव्यवस्था पर मंडराया खतरा

खाड़ी से लेकर यूरोप तक अस्थिरता की लहर, वैश्विक शक्ति-संतुलन में बड़ा बदलाव संभव

वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा है कि पश्चिम एशिया में गहराता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने वाला निर्णायक मोड़ बनता जा रहा है। इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ती प्रत्यक्ष व परोक्ष टकराहट ने पूरे खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। गाज़ा पट्टी से लेकर लेबनान सीमा और सीरिया तक फैले तनाव ने यह संकेत दे दिया है कि यदि यह संघर्ष व्यापक युद्ध में बदलता है तो इसका असर एशिया, यूरोप और अफ्रीका तक दिखाई देगा। चौरसिया ने कहा कि पश्चिम एशिया वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है, और किसी भी सैन्य टकराव से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल तय है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है, ऐसे में पेट्रोल-डीजल महंगे होने, महंगाई दर बढ़ने और रुपये पर दबाव आने की आशंका बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि भारत ने अब तक संतुलित कूटनीति अपनाते हुए सभी पक्षों से संयम की अपील की है, क्योंकि देश के लाखों नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत हैं और उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। यदि समुद्री मार्ग, विशेषकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य प्रभावित होता है, तो वैश्विक व्यापार पर भी व्यापक असर पड़ सकता है।

चंदन चौरसिया ने कहा कि इस संभावित युद्ध का प्रभाव केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। खाड़ी देशों—विशेषकर सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात की आर्थिक स्थिरता पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। इन देशों में कार्यरत भारतीय प्रवासी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का अहम स्तंभ है। यदि क्षेत्र में युद्ध की स्थिति बनती है, तो रोजगार, व्यापार और निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, पश्चिम एशिया में अस्थिरता का असर वैश्विक शेयर बाजारों और आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ेगा, जिससे खाद्यान्न, उर्वरक और औद्योगिक कच्चे माल की कीमतें बढ़ सकती हैं। चौरसिया ने कहा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद दुनिया पहले ही महंगाई और आपूर्ति संकट से जूझ रही है, ऐसे में एक और बड़े युद्ध से वैश्विक मंदी का खतरा गहरा सकता है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह एक ओर अपने सामरिक साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखे, तो दूसरी ओर अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा भी सुनिश्चित करे। कूटनीतिक संतुलन, सामरिक संयम और आर्थिक दूरदर्शिता—तीनों की परीक्षा इस समय हो रही है।

चौरसिया ने कहा कि पश्चिम एशिया का यह संकट केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के नए अध्याय की प्रस्तावना है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो अमेरिका, यूरोप और एशियाई शक्तियों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी से यह बहुध्रुवीय टकराव का रूप ले सकता है। इससे संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ सकती है। भारत के लिए यह समय शांति, संवाद और मध्यस्थता की पहल करने का अवसर भी है, क्योंकि भारत की छवि एक जिम्मेदार और संतुलित वैश्विक शक्ति की रही है। उन्होंने कहा कि युद्ध का कोई स्थायी समाधान नहीं होता अंततः वार्ता की मेज ही निर्णायक होती है। यदि क्षेत्रीय शक्तियां संयम नहीं बरततीं, तो यह संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और मानवीय त्रासदी को जन्म देगा। ऐसे में विश्व समुदाय को सामूहिक पहल करनी होगी ताकि बारूद के इस ढेर को कूटनीति की ठंडी हवा से शांत किया जा सके। यही समय है जब शांति को प्राथमिकता दी जाए, अन्यथा इसके दुष्परिणाम आने वाले वर्षों तक विश्व व्यवस्था को झकझोरते रहेंगे।

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