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*लोकतंत्र के चौराहे पर खड़ा भारत*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा,  ::आज का समय केवल राजनीतिक उथल-पुथल का नहीं है, यह नैतिक और वैचारिक संकट का समय है। राजनीति अब विचारों की प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि नारों की नीलामी बनती जा रही है। सच अदालत में खड़ा है और झूठ संसद में भाषण दे रहा है। जो आज सस्ते नारों के बाजार में बिक रहा है, वही कल मुकद्दर के मयखाने में बैठकर रोएगा इतिहास यही सिखाता है। राजनीति का यह रूप न तो अचानक पैदा हुआ है और न ही यह किसी एक दल, एक नेता या एक विचारधारा तक सीमित है। यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें सत्ता-लालसा, भीड़-मनोविज्ञान, मीडिया-प्रबंधन और बौद्धिक पतन ने मिलकर लोकतंत्र को एक तमाशा बना दिया है।

राजनीति कभी आदर्शों का क्षेत्र हुआ करती थी। स्वतंत्रता संग्राम के समय राजनीति का अर्थ था त्याग, विचार और दूरदृष्टि। आज राजनीति का अर्थ है कितने सेकेंड का क्लिप वायरल होगा, कितनी गालियाँ ट्रेंड करेगी और कितनी अफवाहें फैलेगी। झूठ अब अपवाद नहीं रहा, बल्कि रणनीति बन चुका है। अधूरे तथ्य, संदर्भ से काटे गए बयान, भावनाओं को भड़काने वाली भाषा, भय और घृणा का निर्माण, सब मिलकर राजनीति को सत्य से विमुख कर दिया है।

सच कठिन होता है। सच उत्तरदायित्व मांगता है। सच धैर्य चाहता है। जबकि झूठ तुरंत असर करता है, जवाबदेही से मुक्त करता है और भीड़ को उकसाता है। आज की राजनीति को तुरंत परिणाम चाहिए, दीर्घकालिक समाधान नहीं। इसलिए सच को धीरे-धीरे किनारे कर दिया जा रहा है।

संसद कभी राष्ट्र की चेतना का केंद्र हुआ करती थी। लेकिन आज वह नारेबाज़ी का अखाड़ा, व्यक्तिगत अपमान का मंच और कैमरे के लिए खेला जाने वाला ड्रामा, बनती जा रही है। बहस अब नीति पर नहीं, व्यक्ति पर होती है। तर्क अब तथ्यों से नहीं, भावनाओं से तय होता है।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कभी सत्ता से प्रश्न पूछता था। आज वही सत्ता का प्रेस नोट पढ़ रहा है। ट्रायल से पहले फैसला, आरोप से पहले चरित्र हनन और टीआरपी के लिए राष्ट्रवाद, मीडिया ने सवाल पूछने की जगह पक्ष चुन लिया है।

“देश खतरे में है”, “लोकतंत्र बचाओ”, “संविधान खतरे में है” यह नारा अब सार्वजनिक विमर्श नहीं रहा, बल्कि वोट-मैनेजमेंट के औजार बन चुका है।

इतिहास कभी तुरंत फैसला नहीं देता है, लेकिन जब देता है तो निर्मम होता है। आज जो सत्ता, मीडिया और संस्थानों के सहारे सुरक्षित दिखता है, कल वही दस्तावेजों, फ़ाइलों और गवाहियों में नंगा खड़ा होता है। एपस्टीन फ़ा की फाइल्स केवल एक व्यक्ति या एक देश की कहानी नहीं हैं। वह इस बात का प्रतीक हैं कि “कोई भी सत्ता, कोई भी पद, इतिहास की जांच से नहीं बच सकता।” आज ब्रिटिश पीएम से शुरुआत हो चुकी है। कल कौन? यह प्रश्न नहीं, समय का इंतजार है।

लोकतंत्र में विपक्ष का काम होता है सत्ता पर निगरानी, वैकल्पिक नीति और भविष्य की तैयारी। लेकिन आज का विपक्ष निरंतर नकारात्मकता, संस्थाओं पर अविश्वास और जनता में भ्रम का वातावरण बना रहा है।

यह कहना अनुचित नहीं होगा कि आज विपक्ष का बड़ा हिस्सा आंतरिक रूप से सत्ता-विहीनता को स्वीकार कर चुका है। जब किसी को लगता है कि वह सत्ता में नहीं लौट सकता है, तो वह संस्थाओं को अविश्वसनीय ठहराता है। प्रक्रियाओं को अवैध बताता है और रेखाओं को धूमिल करने लगता है। यही आज दिखाई दे रहा है। यदि सत्ता नहीं मिलेगी, तो व्यवस्था भी नहीं चलने देंगे यह सोच लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक है। यह अराजकता को जन्म देती है। संस्थाओं को कमजोर करती है और भविष्य की नींव हिला देती है।

यदि कल्पना किया जाए कि यदि वही भाषा, वही घृणा, वही अविश्वास सत्ता के हाथ में आ जाए तो क्या होगा? बदले की राजनीति, संस्थागत सफाया और वैचारिक प्रतिशोध यह रफ्तार घातक होगी। जनता सब भूल जाती है, लोगों को यह भ्रम है। जनता देर से बोलती है, लेकिन जब बोलती है तो निर्णायक होती है। जो आज भीड़ के सहारे उछल रहे हैं, कल वही अकेले पड़ जाते हैं।

इतिहास गवाह है कि जब राजनीति ने सच छोड़ा, जब विपक्ष ने विध्वंस चुना और जब सत्ता ने अहंकार अपनाया, तो परिणाम केवल विनाश रहा है। राजनीतिक भाषा का शुद्धिकरण, विचार आधारित विपक्ष, संस्थाओं का सम्मान, मीडिया की जवाबदेही और जनता की वैचारिक जागरूकता आवश्यक है।

सर्वविदित है कि सच हारता नहीं है। वह केवल देर से पहुँचता है। जो आज झूठ की नाव पर सवार हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि इतिहास समुद्र है और झूठ की नावें अक्सर डूबती हैं।
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