झारखण्डराजनीति

पेसा नियमावली को लेकर झारखंड सरकार पर बिफरे पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन, आदिवासियों के साथ धोखाघड़ी का लगाया आरोप

रांची: आज 6 जनवरीको पेसा नियमावली में को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने एक प्रेस वार्ता बुलाई थी। पत्रकारों को संबोधित करते हुए चंपई सोरेन ने कहा की पेसा कानून को लेकर न्यायालय द्वारा कई बार दबाव डालने एवं विपक्ष के आंदोलन के बाद भी सरकार जो नियमावली लेकर आई है, वह पूरी तरह से आदिवासी विरोधी है। इस सरकार ने पेसा नियमावली के नाम पर आदिवासी समाज को धोखा दिया है। अगर आप पिछली नियमावली से तुलना करें तो इस सरकार ने इसके मूल स्वरूप को ही बदल दिया है। सबसे बड़ा बदलाव तो यह है कि इस के गठन से रूढ़िजन्य विधि एवं धार्मिक प्रथा जैसे शब्द गायब हैं। पहले ही पेज पर सरकार ने ग्राम सभा के अध्यक्ष की नियुक्ति के नाम पर “पिछला दरवाजा” खोल दिया है, जो पेसा अधिनियम की मूल भावना के खिलाफ है? जब भारतीय संविधान की धारा 13 (3) (क) भी रूढ़िजन्य प्रथाओं को स्पष्ट तौर पर पहचान दी गई है, तो उसे हटा कर यह सरकार किस को फायदा पहुंचाना चाहती है? अगर आप ग्रामसभा के गठन में रूढ़िजन्य व्यवस्था को दरकिनार कर देंगे तो फिर वैसे पेसा का क्या मतलब है? यह पेसा की मूल भावना का खुला उल्लंघन है। पेसा कानून का मुख्य मकसद ही आदिवासी समाज की रूढ़िजन्य विधियों, सामाजिक, धार्मिक प्रथाओं एवं परंपराओं को संरक्षण देना है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्टों ने अपने कई महत्वपूर्ण निर्णयों में स्पष्ट किया है कि पेसा कानून आदिवासी स्वशासन, सांस्कृतिक संरक्षण और परंपरागत प्रबंधन का संवैधानिक विस्तार है। लेकिन झारखंड सरकार इसके ठीक उलट, उन लोगों को इसके तहत अधिकार देना चाह रही है, जिन्होंने हमारे धर्म, परम्परा एवं जीवनशैली को बहुत पहले छोड़ दिया है। जिनके पास अपना धर्म कोड है, जो पहले से ही अल्पसंख्यक होने के सारे लाभ लेते हैं, वो अब इस नियमावली से आदिवासियों के हक भी छीनेंगे। साल 2013 में ओडिशा के नियमगिरि पर्वत मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने आदिवासी समाज के सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों को मान्यता दी और वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना को रद्द कर दिया। वहां पहले कोर्ट ने कहा था कि जब वहां कोई नहीं रहता तो खनन किया जा सकता है, उसके बदले दूसरी जगह जंगल लगाये जा सकते हैं, लेकिन आदिवासियों ने कहा – “वहाँ हमारे भगवान रहते हैं।” उसके बाद कोर्ट ने भी हमारे धार्मिक मान्यताओं को मान कर खनन रोक दिया। जब कोर्ट भी हमारे धार्मिक मान्यताओं को मानती है तो इस राज्य सरकार को क्या दिक्कत है? ऐसे पेसा का क्या मतलब है? पहले इन लोगों ने TAC की बैठक से राज्यपाल को हटाया और अब यही लोग शेड्यूल एरिया में राज्यपाल के अधिकारों को सीमित कर, सारे अधिकार DC को दे रहे हैं, ताकि वहाँ मनमर्जी चल सके। इस नियमावली में ग्राम सभाओं के अधिकार सीमित कर दिए गए हैं। “सामुदायिक संसाधन” की परिभाषा में अधिसूचित पारंपरिक क्षेत्र में अवस्थित जल, जंगल, जमीन, लघु खनिज समेत सभी प्राकृतिक संसाधनों का अधिकार ग्राम सभा को दिया जाना था, जिसे घटा कर सिर्फ सरना, मसना, जाहेरथान और सांस्कृतिक भवनों तक सीमित कर दिया गया है। शेड्यूल एरिया में जल, जंगल एवं जमीन के अधिकार से आप आदिवासियों को कैसे दूर रख सकते हैं? पेसा के तहत ग्राम सभा को संसाधनों का प्रबंधन करने की छूट होती है, लेकिन यहां उनके अधिकार सीमित कर दिए गए हैं। पहले ग्राम सभा राज्य की योजनाओं एवं DMFT समेत अन्य कार्यक्रमों को अनुमोदित कर सकती थी, लेकिन अब सिर्फ उनकी सहमति ली जायेगी। अगर 30 दिन में सहमति नहीं दी गई तो उसे स्वीकृत मान लिया जाएगा। इस पेसा कानून में गठन से लेकर विवाद तक, हर अधिकार उपायुक्त को दिए गए हैं, फिर ग्राम सभा का क्या रोल होगा, यह समझा जा सकता है? पहले बालू, मिट्टी, पत्थर, मोरम जैसे लघु खनिजों के सारे अधिकार ग्राम सभाओं के पास थे, लेकिन अब उन्हें “सरकार के निर्देशों का पालन” करना है। पहले ग्राम सभा ग्रामीणों के इस्तेमाल हेतु लघु खनिजों के खनन की इजाजत दे सकती थी, लेकिन अब सब कुछ सरकार के हाथ में है। पहले CNT/SPT Act के उल्लंघन के मामलों में ग्राम सभा को भूमि की वापसी का अधिकार दिया गया था, जिसे हटा दिया गया है। उसमें शेड्यूल एरिया की जमीन हस्तांतरण से पहले डीसी को ग्राम सभा से सहमति लेने का प्रावधान भी था। लेकिन ग्राम सभा को मिले ऐसे कई अधिकारों को इस सरकार ने हटा दिया। इस नियमावली में शेड्यूल एरिया के तहत लगने वाले उद्योगों के बारे में कोई गाइडलाइन नहीं है। हर बात उद्योग, डैम अथवा विकास के नाम पर विस्थापन की कीमत हम आदिवासी/ मूलवासी क्यों चुकाएं? ऐसा कैसे चलेगा, और कब तक ? यहां टाटा समूह को पानी की कमी ना हो, इसके लिए चांडिल डैम बनाया गया, उसमें 116 गांव डूब गए, लेकिन वहां के विस्थापितों को क्या मिला? पूरा जमशेदपुर शहर जिन भूमिपुत्रों की जमीन पर बसा है, वे लोग कहाँ हैं? उनकी क्या स्थिति है? उनमें से कितनों के जीवन में बदलाव आया? अगर कंपनियां अरबों- खरबों कमायें, और विस्थापित उजड़ते जायें, तो फिर ऐसे औद्योगिकरण का क्या मतलब है? टाटा लीज के नवीनीकरण की प्रक्रिया तुरंत रोकी जानी चाहिए। कभी डैम, कभी फैक्ट्री, तो कभी विकास योजनाओं के नाम पर आदिवासियों/ मूलवासियों को विस्थापित करने वाले लोग, ना सिर्फ भूमिपुत्रों को वहां से उजाड़ रहे हैं, बल्कि उनकी सामाजिक व्यवस्था तथा उनके अस्तित्व को ही खत्म कर रहे हैं। हम आदिवासी विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन हमें ऐसी व्यवस्था चाहिये, जिसमें हम मात्र चंद रूपयों के लिए पुस्तैनी जमीन नहीं देंगे, बल्कि सभी प्रभावित परिवारों को उनके जमीन पर खुलने वाली फैक्ट्रियों के लाभ में साझीदार बनाया जाये, ताकि उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सके। जिस दिन कैबिनेट की बैठक में सरकार ने पेसा अधिनियम को पास किया, उसी कैबिनेट में हिंडाल्को को नोवामुंडी (पश्चिम सिंहभूम) में साढ़े आठ सौ एकड़ जमीन, बिना ग्राम सभा की सहमति के दी गई। उस जमीन पर आदिवासी समाज के लोग हजारों सालों से खेती करते हैं, मवेशी चराते हैं, उस भूमि पर देशाउली व जाहेरस्थान भी है। वहां के ग्रामीण इसका विरोध कर रहे हैं। इसी से पता चलता है कि सरकार पेसा एवं ग्राम सभाओं के अधिकारों को कितनी अहमियत देती है। इस नियमावली को बनाते समय राज्य सरकार को शेड्यूल एरिया में शराब की दुकानें खुलवाने से लेकर शराब भट्ठियां तक सब कुछ याद रहा, लेकिन वे आदिवासियों के हितों का ध्यान रखना भूल गए। विस्थापितों के अधिकारों पर कोई बात नहीं हुई। यही इस सरकार की प्राथमिकता है। आदिवासियों के अधिकारों को छीनने की इस कोशिश का, हर स्तर पर, पुरजोर विरोध होगा।

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