जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने केंद्र सरकार से केंद्र शासित प्रदेश का पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर दिया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा 25 सितंबर को पेश किए गए इस प्रस्ताव पर सदन में व्यापक चर्चा हुई।
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, :: प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर के पूर्ववर्ती विधानसभा प्रस्तावों का भी उल्लेख किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य के दर्जे की बहाली का मुद्दा वर्तमान राजनीतिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। विधानसभा में प्रस्ताव पारित होने के साथ ही जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक और राजनीतिक स्थिति को लेकर बहस एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई है। हालांकि प्रस्ताव का केंद्रबिंदु पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना है, लेकिन बहस के दौरान अनुच्छेद 370, अनुच्छेद 35ए, विशेष दर्जे और स्वायत्तता जैसे विषय भी सामने आए। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जम्मू-कश्मीर की वर्तमान संवैधानिक स्थिति अगस्त 2019 में हुए बड़े बदलावों के बाद अस्तित्व में आई थी। उस समय जम्मू-कश्मीर को पुनर्गठित कर दो केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बनाए गए थे।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 25 सितंबर को विधानसभा में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने संबंधी प्रस्ताव पेश किया। प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य के दर्जे को बहाल करने की मांग की गई है। विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव का राजनीतिक महत्व इस बात में है कि यह केवल किसी राजनीतिक दल की मांग के रूप में नहीं, बल्कि निर्वाचित विधानसभा के प्रस्ताव के रूप में सामने आया है। हालांकि विधानसभा का प्रस्ताव अपने आप में केंद्र सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के संबंध में अंतिम निर्णय संसद और केंद्र सरकार के संवैधानिक एवं विधायी अधिकार-क्षेत्र से जुड़ा है। इसलिए प्रस्ताव को जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित विधानसभा की राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना अधिक उपयुक्त है। यही वह बिंदु है जहां से जम्मू-कश्मीर के भविष्य के प्रशासनिक ढांचे को लेकर केंद्र और केंद्र शासित प्रदेश के बीच संवाद का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
नए प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा अतीत में पारित प्रस्तावों का भी उल्लेख किया गया है। विशेष रूप से 2000 और 2024 के प्रस्तावों का संदर्भ इस बहस को ऐतिहासिक निरंतरता प्रदान करता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य के दर्जे और जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक-संवैधानिक स्थिति का प्रश्न अचानक पैदा हुआ विषय नहीं है। अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में इस मुद्दे पर विधानसभा के भीतर चर्चा होती रही है। 2024 के बाद जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार और विधानसभा की वापसी ने इस बहस को नया राजनीतिक मंच उपलब्ध कराया। अब विधानसभा के माध्यम से राज्य के दर्जे की बहाली की मांग सामने आना इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
प्रस्ताव पर चर्चा से पहले इसमें संशोधन के लिए 10 प्रस्ताव सामने आए। इनमें कुछ संशोधनों में अनुच्छेद 370, अनुच्छेद 35ए, विशेष दर्जे और स्वायत्तता का स्पष्ट उल्लेख करने की मांग की गई थी। यहीं से विधानसभा की बहस केवल राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रश्न तक सीमित नहीं रही, बल्कि जम्मू-कश्मीर की व्यापक संवैधानिक पहचान और अगस्त 2019 से पहले की स्थिति से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में आने लगे। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के आग्रह के बाद आठ विधायकों ने अपने संशोधन वापस ले लिए। इससे प्रस्ताव को एक व्यापक लेकिन अपेक्षाकृत सीमित विषय पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली पर केंद्रित रखने का रास्ता साफ हुआ। राजनीतिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण था, क्योंकि यदि प्रस्ताव में अनुच्छेद 370 और विशेष दर्जे जैसे मुद्दों को प्रमुखता से शामिल किया जाता, तो सदन की बहस का स्वरूप और अधिक व्यापक तथा विवादास्पद हो सकता था।
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अनुच्छेद 370 लंबे समय से केंद्रीय विषय रहा है। अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक व्यवस्था में बड़े बदलाव किए और इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया। इसके बाद से जम्मू-कश्मीर की राजनीति में दो अलग-अलग प्रश्न अक्सर एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं। पहला- अगस्त 2019 से पहले की संवैधानिक स्थिति से जुड़े मुद्दे। दूसरा- जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना। इन दोनों विषयों को समान मानना संवैधानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। राज्य का दर्जा एक प्रशासनिक-संवैधानिक प्रश्न है, जबकि अनुच्छेद 370 से संबंधित प्रश्न भारत के संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए विधानसभा के वर्तमान प्रस्ताव का मूल विषय पूर्ण राज्य का दर्जा है, जबकि अनुच्छेद 370 और विशेष दर्जे को लेकर अलग राजनीतिक और संवैधानिक बहस मौजूद है।
प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भाजपा विधायकों ने स्वायत्तता तथा अगस्त 2019 से पहले की संवैधानिक स्थिति के संदर्भों का विरोध किया। भाजपा सदस्यों ने सदन में नारेबाजी की और बाद में बहिर्गमन किया। यह घटनाक्रम जम्मू-कश्मीर की राजनीति में मौजूद वैचारिक अंतर को सामने लाता है। एक तरफ प्रस्ताव का समर्थन करने वाले पक्ष का जोर जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस देने पर है। दूसरी तरफ भाजपा का राजनीतिक दृष्टिकोण अगस्त 2019 के संवैधानिक बदलावों को अलग संदर्भ में देखता है और स्वायत्तता या पूर्व संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े संदर्भों का विरोध करता है। इस तरह विधानसभा की बहस में दो अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई दिए।
जम्मू-कश्मीर को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि पूर्ण राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में महत्वपूर्ण अंतर होता है। पूर्ण राज्य में निर्वाचित सरकार के साथ राज्य की विधायिका और प्रशासनिक अधिकारों का एक व्यापक संवैधानिक ढांचा होता है। केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र सरकार की भूमिका अपेक्षाकृत अधिक होती है, हालांकि अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकार और संवैधानिक व्यवस्थाएं एक जैसी नहीं होती है। जम्मू-कश्मीर का वर्तमान केंद्र शासित प्रदेश विशेष संवैधानिक व्यवस्था वाला है और यहां विधानसभा भी है। लेकिन इसका प्रशासनिक ढांचा अगस्त 2019 से पहले के पूर्ण राज्य से अलग है। इसी अंतर को लेकर जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की राजनीति में पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली एक प्रमुख मांग बनती रही है।
अगस्त 2019 जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक इतिहास में एक निर्णायक पड़ाव रहा। उस समय केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव किए और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत तत्कालीन राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बने। इसके बाद लंबे अंतराल के पश्चात जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए और निर्वाचित सरकार का गठन हुआ। विधानसभा के अस्तित्व में आने के साथ ही राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रश्न राजनीतिक विमर्श में फिर प्रमुखता से उभरा। इस पृष्ठभूमि में वर्तमान प्रस्ताव को जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित विधानसभा द्वारा अपनी राजनीतिक मांग दर्ज कराने के रूप में देखा जा सकता है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए इस प्रस्ताव का राजनीतिक महत्व दो स्तरों पर है। पहला, यह उनकी सरकार की उस मांग को औपचारिक रूप देता है कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस मिलना चाहिए। दूसरा, संशोधनों को वापस लेने का आग्रह करके प्रस्ताव को उन मुद्दों तक सीमित रखने की कोशिश दिखाई देती है जिन पर सदन में व्यापक सहमति बनाई जा सके। अनुच्छेद 370 और स्वायत्तता जैसे मुद्दे जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अत्यंत संवेदनशील रहे हैं। ऐसे में पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को इन मुद्दों से अलग रखना राजनीतिक संवाद की दिशा में एक अलग रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि अलग-अलग दल इस रणनीति और उसके राजनीतिक अर्थ की अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं।
पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल होने की मांग केवल संवैधानिक या राजनीतिक बहस नहीं है। इसका संबंध प्रशासन, विकास, स्थानीय प्रतिनिधित्व और शासन व्यवस्था से भी है। राज्य का दर्जा मिलने से प्रशासनिक अधिकारों की संरचना में परिवर्तन आएगा। इससे निर्वाचित सरकार और केंद्र के बीच अधिकारों की वर्तमान व्यवस्था में भी बदलाव हो सकता है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि राज्य का दर्जा अपने आप में बेरोजगारी, विकास, निवेश, पर्यटन, सुरक्षा या अन्य स्थानीय समस्याओं का स्वतः समाधान नहीं करता। इन विषयों के समाधान के लिए प्रशासनिक क्षमता, आर्थिक नीतियां, कानून-व्यवस्था, निवेश और स्थानीय संस्थाओं की प्रभावशीलता भी महत्वपूर्ण रहेगी। इसलिए राज्य का दर्जा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के समग्र विकास का प्रश्न इससे कहीं व्यापक है।
पिछले दशकों में जम्मू-कश्मीर की चर्चा अक्सर सुरक्षा, आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता के संदर्भ में होती रही है। अब निर्वाचित विधानसभा के सक्रिय होने के बाद विकास, प्रशासन, रोजगार और राज्य के दर्जे जैसे मुद्दे भी राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता पा रहे हैं। यह लोकतांत्रिक राजनीति की स्वाभाविक प्रक्रिया है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने क्षेत्र और प्रदेश से जुड़े प्रश्नों को विधानसभा के भीतर उठाएं। पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रस्ताव भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि इस मांग का अंतिम परिणाम केंद्र सरकार और संसद के निर्णयों, संवैधानिक प्रक्रियाओं तथा व्यापक राजनीतिक संवाद पर निर्भर करेगा।
वर्तमान घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष केंद्र और जम्मू-कश्मीर के बीच संवाद की आवश्यकता है। एक निर्वाचित विधानसभा द्वारा राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग रखी गई है। दूसरी ओर केंद्र सरकार के पास जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण अधिकार हैं। ऐसे में राजनीतिक मतभेदों को लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर संवाद के माध्यम से संबोधित करना महत्वपूर्ण होगा। राज्य के दर्जे पर चर्चा करते समय सुरक्षा, प्रशासनिक दक्षता, आर्थिक विकास, स्थानीय प्रतिनिधित्व और संवैधानिक व्यवस्था, इन सभी पहलुओं को साथ रखकर विचार करना होगा।
विधानसभा के प्रस्ताव के बाद स्वाभाविक रूप से अगला प्रश्न यही है कि केंद्र सरकार इस मांग पर क्या कदम उठाती है। प्रस्ताव पारित होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके बाद संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया का प्रश्न सामने आता है। जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए केंद्र स्तर पर निर्णय और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया की जरूरत होगी। इसलिए विधानसभा का प्रस्ताव एक राजनीतिक संदेश और मांग का औपचारिक दस्तावेज है, अंतिम निर्णय नहीं। आने वाले समय में केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार के बीच इस विषय पर संवाद इसकी दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रस्ताव पारित किया जाना केंद्र शासित प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। प्रस्ताव में 2000 और 2024 के विधानसभा प्रस्तावों का उल्लेख, संशोधनों को लेकर हुई बहस, अनुच्छेद 370 और स्वायत्तता के संदर्भों पर मतभेद तथा भाजपा विधायकों का विरोध—इन सभी घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति पर राजनीतिक मत अलग-अलग है। फिर भी एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि निर्वाचित विधानसभा ने अपनी मांग लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से दर्ज कराई है। अब असली प्रश्न यह है कि इस प्रस्ताव के बाद केंद्र और जम्मू-कश्मीर के बीच किस प्रकार का संवाद विकसित होता है। क्या पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली पर कोई समयबद्ध प्रक्रिया बनती है, क्या संवैधानिक और प्रशासनिक पहलुओं पर सहमति बनती है और क्या जम्मू-कश्मीर की जनता की विकास तथा प्रतिनिधित्व संबंधी आकांक्षाओं को आगे की नीति में पर्याप्त स्थान मिलता है, इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले समय में सामने आएंगे। जम्मू-कश्मीर का भविष्य केवल एक संवैधानिक दर्जे का प्रश्न नहीं है। यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, सुशासन, विकास, सुरक्षा और संघीय व्यवस्था के बीच संतुलन का भी प्रश्न है। विधानसभा का प्रस्ताव इस बहस का नया अध्याय खोलता है; अब इस अध्याय की अगली पंक्तियां केंद्र और जम्मू-कश्मीर के बीच होने वाले संवाद से लिखी जानी है।
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