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5000 साल पुराना है इतिहास,दलदल में घर बनाकर रहते हैं यहां के लोग…
जितनी तेजी से घर का मतलब पक्का मकान होता गया उतनी ही तेजी से बेंतों,मिट्टियों से बने घर आधुनिकता से लगी दौड़ में पीछे होते गए।इस दौड़ में खर,खपरैल इतिहास हो गए।यह केवल स्थानीय घटना बन कर नहीं रही।समूचे विश्व पर इसका प्रभाव पड़ा।जन्म से केवल मकान देखनेवालों के लिए अब फूस,खपरैल,बेंत से बनी घरें और उनमें रहने वालों का जीवन केवल आश्चर्य की बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि इराक की सीमा से सटे इलाकों में दलदली भूमि पर एक समुदाय करची, बेंतों से बने घरों में निवास करते रहे।
इस दलदली भूमि पर करीब 5,000 वर्षों से लोग घर बना कर रहते हैं।इन दलदली भूमि पर रहने वालों को मार्श अरब या अरबी में Ma’dan कहा जाता है।टाइग्रिस और यूफरेट्स की यह दलदली भूमि का क्षेत्रफल कभी 9,000 वर्ग मील का हुआ करता था।इस दलदली भूमि पर बहुत सारी जनजातियां मिल-जुल कर रहा करती थी।उन समुदायों की पहचान वहाँ बने तैरते हुए घरों से होती थी। ये तैरती घरें बेंतों और सौन्ठियों से बनी होती थी।सौन्ठियाँ पानी या दलदली क्षेत्रों में उगी घासों (लकड़ी की तरह ठोस नहीं) होती है जो भारत के पूर्वी राज्यों जैसे बिहार में उगती है।



