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बारूद की लकीर पर खड़े दो पड़ोसी: क्या युद्ध की आहट से निकलेगा शांति का रास्ता: चौरसिया

सीमा से संसद तक तनाव: पाकिस्तान-अफगान टकराव से बदलती दक्षिण एशिया की सियासत

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तेज़ हुए सैन्य तनाव ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को एक बार फिर अस्थिरता के मुहाने पर ला खड़ा किया है। सीमा पार हमले, जवाबी कार्रवाई, ड्रोन और हवाई हमलों के दावे इन सबने हालात को ओपन वॉर जैसी गंभीर स्थिति में पहुंचा दिया है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगान धरती से संचालित तत्व उसकी सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं, जबकि अफगान पक्ष इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है। वास्तविकता यह है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास का इतिहास लंबा है। ड्यूरंड लाइन की वैधता, सीमाई इलाकों में उग्रवाद, और रणनीतिक गुटबंदी जैसे मुद्दे वर्षों से सुलगते रहे हैं। वर्तमान टकराव उसी असंतोष का विस्फोट है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक भी है। जब दो अस्थिर अर्थव्यवस्थाएँ हथियारों की भाषा में संवाद करती हैं, तो उसका बोझ सीमावर्ती नागरिकों, शरणार्थियों और क्षेत्रीय व्यापार पर पड़ता है। इस टकराव ने पहले ही सीमा चौकियों, आपूर्ति शृंखलाओं और मानवीय राहत के रास्तों को प्रभावित किया है। यदि तत्काल संयम नहीं बरता गया, तो यह आग सीमाओं से बाहर फैलकर व्यापक क्षेत्रीय संकट का रूप ले सकती है।

चौरसिया ने कहा कि भविष्य की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों देश सैन्य दबाव को राजनीतिक संवाद में बदल पाते हैं या नहीं। अल्पकाल में तनाव और बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता विशेषकर तब, जब घरेलू राजनीति में सख़्त रुख़ को लोकप्रिय समर्थन मिलता हो। पाकिस्तान के भीतर सुरक्षा प्रतिष्ठान पर दबाव है कि वह आतंकी ढांचे के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई दिखाए; वहीं अफगान नेतृत्व के सामने अपनी संप्रभुता और वैधता सिद्ध करने की चुनौती है। ऐसे में किसी भी छोटी घटना का बड़ा सैन्य विस्तार संभव है। दीर्घकाल में, यदि संघर्ष जारी रहता है, तो इसका असर तीन स्तरों पर दिखेगा पहला, उग्रवादी नेटवर्क का पुनर्संरचन; दूसरा, शरणार्थी संकट और मानवीय दबाव; तीसरा, क्षेत्रीय शक्तियों की सक्रिय दखल। ईरान, मध्य एशियाई देश, चीन और पश्चिमी शक्तियाँ अपने-अपने हितों के अनुरूप समीकरण साधने की कोशिश करेंगी। दक्षिण एशिया में अस्थिरता भारत सहित सभी पड़ोसियों के लिए चिंता का विषय बनेगी, क्योंकि किसी भी तरह की अराजकता सीमा-पार गतिविधियों और सुरक्षा चुनौतियों को बढ़ा सकती है। आर्थिक दृष्टि से भी यह संघर्ष दोनों देशों को भारी कीमत चुकवाएगा रक्षा व्यय में वृद्धि, निवेश में गिरावट और विकास योजनाओं पर विराम।

चंदन चौरसिया ने कहा कि समाधान का रास्ता कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं। इतिहास बताता है कि सबसे तीखे संघर्ष भी अंततः संवाद की मेज पर ही सुलझते हैं। यदि दोनों पक्ष चाहें, तो चरणबद्ध युद्धविराम, तटस्थ मध्यस्थ की मौजूदगी और सीमा सुरक्षा पर संयुक्त तंत्र की स्थापना से शुरुआत हो सकती है। एक संभावित रूपरेखा यह हो सकती है कि पहले सीमाई क्षेत्रों में तत्काल सीज़फायर लागू किया जाए, फिर सुरक्षा अधिकारियों के स्तर पर विश्वास-निर्माण बैठकें हों, और उसके बाद राजनीतिक नेतृत्व की औपचारिक वार्ता। संयुक्त निगरानी तंत्र, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान और उग्रवादी समूहों पर ठोस कार्रवाई की पारदर्शी व्यवस्था ये कदम विश्वास बहाली के मूल आधार बन सकते हैं। कूटनीति की इस प्रक्रिया में क्षेत्रीय मंचों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की रचनात्मक भूमिका भी अहम होगी। अंततः प्रश्न यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्या दोनों देश अपने नागरिकों को स्थिर और सुरक्षित भविष्य दे पाएंगे। यदि संवाद की खिड़की शीघ्र नहीं खोली गई, तो यह टकराव केवल दो देशों का नहीं, पूरे क्षेत्र की शांति का संकट बन सकता है। दक्षिण एशिया को आज सैन्य शक्ति से अधिक राजनीतिक विवेक की आवश्यकता है क्योंकि शांति ही वह विकल्प है जो स्थायी सुरक्षा और विकास की राह खोल सकता है।

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