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*जीआई टैग की ओर बढ़ी टिकुली कला*

- बिहार म्यूजियम की पहल से प्राचीन विरासत को मिलेगी वैश्विक पहचान

– कलाकारों को मिलेगा सीधा फायदा

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना। बिहार की पौराणिक और समृद्ध टिकुली कला अब अंतरराष्ट्रीय पहचान की ओर कदम बढ़ा चुकी है। टिकुली पेंटिंग जिसने सदियों से संस्कृति संभाली, उसे अब वैश्विक पहचान मिलने वाली है। अब पारंपरिक टिकुली कला वैश्विक बाजार में लोकल से ग्लोबल बनने की तैयारी कर रही है।
बिहार म्यूजियम की पहल से टिकुली पेंटिंग को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। उम्मीद है कि मार्च 2026 तक टिकुली कला को जीआई टैग मिल जाएगा।

अब तक बिहार के सिलाव का खाजा, शाही लीची, तसर सिल्क के साथ-साथ मधुबनी पेंटिंग और मंजूषा कला को जीआई टैग मिल चुका है। इसी कड़ी में अब टिकुली कला का नाम भी जुड़ने वाला है।

सदियों से बिहार की संस्कृति और परंपरा को संजोए रखने वाली टिकुली पेंटिंग अब “लोकल से ग्लोबल” बनने की तैयारी में है। बिहार म्यूजियम की ओर से इसके डॉक्यूमेंटेशन का कार्य पूरा कर लिया गया है, ताकि ऐतिहासिक प्रमाणों और परंपरागत विशेषताओं के आधार पर इसे जीआई टैग दिलाया जा सके।

वर्ष 2024 में पद्मश्री से सम्मानित टिकुली कला के वरिष्ठ कलाकार अशोक कुमार विश्वास ने बताया कि जीआई टैग मिलने से कलाकारों को सीधा लाभ होगा। देश-विदेश से ऑर्डर मिलने की संभावनाएं बढ़ेंगी, जिससे कलाकारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

वहीं टिकुली कलाकार रूचि सिंह ने कहा कि यह कला किसी पहचान की मोहताज नहीं है। टिकुली कला को जीआई टैग दिलाने की मांग पहले भी उठती रही है। बिहार में कई ऐसे कलाकार हैं जिन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिल चुका है। अशोक कुमार विश्वास को पद्मश्री, जबकि तपन कुमार विश्वास, किरण कुमारी सहित दर्जनों कलाकारों को राज्य पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। खादी मॉल, एम्पोरियम, दिल्ली हाट और जी-20 भुवनेश्वर जैसे मंचों पर टिकुली कला की प्रदर्शनियां भी लग चुकी हैं।

जीआई टैग से होंगे ये फायदे
जीआई टैग मिलने के बाद टिकुली कला की पहचान वैश्विक स्तर पर स्थापित होगी। इससे जुड़े कलाकारों को प्रमाणपत्र मिलेगा, जिससे उन्हें उचित पारिश्रमिक और बाजार उपलब्ध होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग बढ़ने से बिहार के कलाकारों को आर्थिक संबल मिलेगा और राज्य की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत होगी।

कौन होता है जीआई टैग के लिए पात्र?
किसी भी क्षेत्र की कला, भोजन या उत्पाद यदि कम से कम 15 वर्षों से अस्तित्व में है और उसकी विशिष्ट पहचान है, तो वह जीआई टैग के लिए पात्र होता है।

बिहार म्यूजियम के अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा ने बताया कि मिथिला, मंजूषा, एप्लिक सुजनी और सिक्की कला को पहले ही जीआई टैग मिल चुका है। इस बार टिकुली पेंटिंग को जीआई टैग दिलाने की ठोस पहल की गई है। उन्होंने कहा कि टिकुली बिहार की सबसे प्राचीन कलाओं में से एक है, जिसके मुगल काल से प्रचलन के प्रमाण मिलते हैं। इस कला से 10 हजार से अधिक महिलाएं जुड़ी हुई हैं और एक दर्जन से अधिक कलाकार राज्य पुरस्कार से सम्मानित हैं।

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