*सामाजिक संतुलन की राजनीति और नए अन्याय की आशंका*
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, :भारतीय लोकतंत्र की आत्मा समता, न्याय और समान अवसरों की अवधारणा में निहित है। संविधान की प्रस्तावना से लेकर नीति-निर्देशक तत्वों तक, हर जगह यह स्पष्ट किया गया है कि राज्य का कर्तव्य केवल शासन करना नहीं है, बल्कि समाज में व्याप्त ऐतिहासिक अन्यायों को पहचानना, उन्हें दूर करना और भविष्य में किसी नए अन्याय की संभावना को जन्म न लेने देना भी है। समाज समतामूलक हो, सबको बराबरी का हक मिले, जिनके साथ पहले अन्याय हुआ है, उनका विशेष ध्यान रखा जाए। यह विचार न केवल नैतिक रूप से सही हैं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला भी हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या समता की स्थापना के नाम पर नए अन्याय के द्वार तो नहीं खुल रहे?
यहीं से सत्ता संचालकों की भूमिका निर्णायक हो जाती है। क्योंकि नीति यदि असंतुलित हो, उद्देश्य यदि अस्पष्ट हो और क्रियान्वयन यदि पक्षपातपूर्ण हो, तो वही समता का औजार एक वर्ग के लिए न्याय और दूसरे के लिए दंड बन जाता है।
भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है कि जब भी कोई नीति सामाजिक असंतोष को जन्म देती है, तो उसका दोष या तो संविधान पर डाल दिया जाता है, या न्यायपालिका पर, या फिर पूर्ववर्ती सरकारों पर। लेकिन लोकतंत्र में सत्ता केवल अधिकार नहीं होती है, बल्कि उत्तरदायित्व भी होती है। यदि किसी निर्णय से समाज में असंतुलन पैदा होता है, तो उसका नैतिक दायित्व नीति-निर्माताओं से कोई नहीं छीन सकता है। राजनीति में कर्तव्यपरायणता, स्पष्टता और समानता इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि कर्तव्यपरायणता सत्ता को अहंकार से बचाती है। स्पष्टता भ्रम और अविश्वास को रोकती है और समानता लोकतंत्र को वर्ग–संघर्ष से बचाती है।
भारत का समाज वर्ण, जाति और समुदायों में विभाजित रहा है। यह विभाजन केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक भी रहा है। औपनिवेशिक काल में इस विभाजन को और गहरा किया गया है, ताकि फूट डालो और राज करो की नीति सफल हो सके। स्वतंत्रता के बाद आरक्षण, सामाजिक न्याय और विशेष प्रावधान इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लाए गए हैं। उद्देश्य स्पष्ट था कि जिन्हें सदियों तक वंचित रखा गया, उन्हें मुख्यधारा में लाना। लेकिन समय के साथ यह प्रश्न उभरने लगा कि क्या नीति स्थायी समाधान बन रही है? या यह केवल सत्ता का उपकरण बनती जा रही है?
पिछले 11 वर्षों में नरेन्द्र मोदी ने अपनी राजनीतिक हनक और नेतृत्व क्षमता के माध्यम से बिखरी हुई वर्ण-प्रवृत्तियों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया है। उनकी राजनीति की विशेषता रही है पहचान की राजनीति से आगे राष्ट्र की बात। जाति से ऊपर विकास का विमर्श और तुष्टिकरण के बजाय संतुलन का प्रयास। यह पहली बार हुआ है जब सत्ता ने खुलकर यह कहने का साहस किया कि “सरकार सबकी है, किसी एक वर्ग की नहीं।”
नरेन्द्र मोदी काल में राजनीति की रेसिपी बदली है। इसमें राष्ट्रवाद का नमक, विकास की मिर्च आत्मसम्मान का मसाला और सांस्कृतिक चेतना की खुशबू डाली गई है। इस रेसिपी का उद्देश्य था वर्णों में बंटी समाजिक थाली को एक दस्तरख्वान पर लाना। यह प्रयास पूर्णतः निर्विवाद नहीं रहा, लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि लंबे समय बाद सत्ता ने एकता को केंद्रीय विषय बनाया। आज जो पकवान दस्तरख्वान पर परोसा गया है, उसका स्वाद केवल सत्ता या विपक्ष नहीं, बल्कि मिलॉर्ड स्वयं चखेंगे। यह मिलॉर्ड कभी न्यायपालिका के रूप में। कभी अकादमिक संस्थानों के रूप में और कभी समाज की सामूहिक चेतना के रूप में निर्णय देगा कि चूल्हे पर पकाया गया भोजन समाज के लिए पोषक है या विषाक्त।
यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) में प्रस्तावित या लागू किए गए बदलाव इस पूरे विमर्श को समझने का सबसे उपयुक्त उदाहरण हैं। यहाँ प्रश्न केवल शिक्षा नीति का नहीं है, बल्कि अवसरों की समानता। योग्यता बनाम पहचान और अकादमिक स्वतंत्रता का है। यूजीसी बदलाव यह दिखाता है कि यदि नीति स्पष्ट न हो, संवाद अधूरा हो और आशंकाओं को अनदेखा किया जाए तो सुधार भी विवाद बन जाता है।
समाज में यह प्रश्न लगातार गहराता जा रहा है कि समानता कब विशेषाधिकार बन जाती है? और विशेष ध्यान कब अन्याय का कारण बनता है? यदि किसी नीति से एक वर्ग को अवसर मिलता है, लेकिन दूसरा वर्ग स्थायी रूप से हतोत्साहित होता है, तो यह सामाजिक संतुलन के लिए खतरा बन जाता है।
इतिहास साक्षी है कि पुराने अन्याय को ठीक करने के नाम पर, नए अन्याय जन्म लेते हैं, यदि सत्ता सतर्क न हो। आज के समय में खतरे के संकेत हैं स्थायी वर्गीकरण, पहचान आधारित राजनीति, योग्यता का अवमूल्यन और सामाजिक संवाद का टूटना।
राजनीति केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं है। यह समाज की दिशा तय करती है। आने वाली पीढ़ियों का भविष्य गढ़ती है और राष्ट्रीय चरित्र को आकार देती है। इसलिए राजनीति में कर्तव्यपरायणता, स्पष्टता और समानता को नारे नहीं, व्यवहार बनाना होगा।
भविष्य का भारत न केवल समतामूलक होना चाहिए बल्कि संतुलित भी। जहाँ वंचितों को अवसर मिले लेकिन किसी और को दंड न भुगतना पड़े। जहाँ इतिहास का प्रायश्चित हो लेकिन भविष्य बंधक न बने।
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