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*डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल का पहला वर्ष*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा ::व्हाइट हाउस की सीढ़ियों पर खड़ा वह व्यक्ति, जो अपने भाषणों में शब्दों से नहीं, चुनौती से बात करता है “डोनाल्ड जॉन ट्रंप”। राष्ट्रपति पद की शपथ लेते हुए उन्होंने एक बार फिर वही नारा दोहराया “America First.” यह कोई नया वाक्य नहीं था। यह एक चेतावनी थी, दुनिया के लिए।

एक वर्ष बीत चुका है। जब उन्होंने कार्यभार संभाला था, पूरी दुनिया उनके पहले वर्ष के लेखे-जोखे में उलझी है। सवाल केवल यह नहीं है कि ट्रंप ने अमेरिका के लिए क्या किया, सवाल यह है कि उन्होंने दुनिया के साथ क्या किया? क्या उन्होंने अमेरिका को “महान” बनाया, या उन्होंने विश्व व्यवस्था को “असभ्य” बना दिया?

परंपरागत रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति विश्व राजनीति में “नेतृत्व” का दावा करते रहे हैं। यह नेतृत्व कभी कूटनीति से, कभी समझौते से और कभी सभ्य दबाव से चलता रहा। ट्रंप ने इस परंपरा को उलट दिया। उनकी भाषा में “संवाद” नहीं था, उनके शब्दों में “संवेदनशीलता” नहीं थी, उनके व्यवहार में “संकोच” नहीं था। वे राष्ट्रपति कम, वैश्विक मंच पर खड़े एक ऐसे सरदार अधिक लगे, जो हर बैठक में यह जताना चाहता था कि “मैं यहाँ समझौता करने नहीं, मैं यहाँ शर्तें थोपने आया हूँ।” संयुक्त राष्ट्र, नाटो, डब्ल्यूएचओ, पेरिस जलवायु समझौता, हर मंच पर उनका स्वर एक जैसा रहा या तो मेरी शर्त मानो, या मेरी राह से हट जाओ।

कागज पर यह नारा देशभक्ति लगता है। पर व्यवहार में यह बन गया “बाकी दुनिया बाद में अगर कभी नहीं तो कभी नहीं ।” मित्र देशों पर व्यापारिक शुल्क। सहयोगियों को “फ्रीलोडर” कहना। अंतरराष्ट्रीय संधियों को “अमेरिका विरोधी” बताकर त्याग देना। युद्ध, शरणार्थी, जलवायु, महामारी, हर वैश्विक संकट से दूरी। ट्रंप का अमेरिका दुनिया का नेतृत्व नहीं करना चाहता है, दुनिया पर हुकूमत करना चाहता है। यह वही अमेरिका है जो कभी लोकतंत्र का प्रहरी कहलाता था, आज वह स्वयं लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास करता दिखता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल शक्ति का खेल नहीं होती है। यह भाषा, संकेत, शिष्टाचार और संतुलन का संसार होती है। ट्रंप ने इस संसार में हथौड़े की तरह प्रवेश किया। मित्र राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना। शत्रु देशों को सोशल मीडिया पर धमकियाँ देना। वैश्विक मंचों पर व्यंग्य और कटाक्ष से वातावरण विषाक्त करना। उनकी शैली ने यह सिद्ध कर दिया है कि वे संवाद में विश्वास नहीं रखते हैं, वे वर्चस्व में विश्वास रखते हैं। यह कूटनीति नहीं थी बल्कि यह शक्ति का उद्दंड प्रदर्शन था।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एक वैश्विक व्यवस्था बनी थी संयुक्त राष्ट्र। विश्व स्वास्थ्य संगठन। विश्व व्यापार संगठन। नाटो और अन्य गठबंधन। इन संस्थाओं का उद्देश्य था संघर्ष को संवाद में बदलना। ट्रंप के लिए ये संस्थाएँ थीं “अमेरिका के पैसे पर पलने वाले बोझ।” उनकी नीति स्पष्ट थी या तो ये संस्थाएँ अमेरिका के इशारे पर चलें, या अमेरिका इनसे किनारा कर ले। लेकिन सवाल यह है कि जब दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश साझा मंचों से मुंह मोड़ ले, तो विश्व व्यवस्था किस दिशा में जाएगी? उत्तर होगा अराजकता की ओर।

इतिहास बताता है कि साम्राज्य शक्ति से बनते हैं, लेकिन सभ्यता शिष्टता से चलती है। ट्रंप की राजनीति शक्ति को सर्वोच्च मानती है, शिष्टता को कमजोरी। उनके लिए समझौता हार है। विनम्रता डर है और सहमति झुकाव है। लेकिन दुनिया केवल ताकत से नहीं चलती है। दुनिया स्मृति से चलती है। दुनिया अपमान नहीं भूलती। आज भले ही डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस में हों, लेकिन इतिहास के पन्ने, उनकी भाषा, उनके व्यवहार, उनकी उद्दंडता, सब कुछ दर्ज कर रहा है।

एक वर्ष पूरा होना किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के लिए औपचारिक रूप से “बधाई” का अवसर होता है। सभ्यता कहती है कि एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र के मुखिया को शिष्टाचारवश शुभकामनाएँ दे। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या एक ऐसे व्यक्ति को जो वैश्विक मंच पर लगातार अपमान, अवज्ञा और उपहास का “पंच” मारता रहा हो, क्या उसे केवल औपचारिक बधाई पर्याप्त है? एक राष्ट्र के नाते हाँ, बधाई बनती है। लेकिन एक व्यक्तित्व के नाते, जिसने मानवीय संवेदना, सभ्यता और संस्कृति तीनों की सीमाएँ लांघी हों, उसके लिए इतिहास के पास बधाई से अधिक चेतावनी होती है और कभी-कभी बधाई नहीं, बद्दुआ ही सभ्यता की आखिरी भाषा बन जाती है।

डोनाल्ड ट्रंप को समझने के लिए उनकी नीतियों से पहले उनके मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है। वे केवल एक राष्ट्रपति नहीं हैं, वे एक “घटना” हैं, ऐसी घटना, जिसमें राजनीति कम और व्यक्तित्व अधिक बोलता है। उनका हर निर्णय नीति से नहीं, स्वभाव से उपजता है। उनका स्वभाव है स्वयं को केंद्र में रखना, दूसरों को परिधि में धकेल देना।

परंपरागत लोकतंत्र में राष्ट्राध्यक्ष स्वयं को “जनता का सेवक” कहता है। ट्रंप स्वयं को “विजेता” कहते हैं। उनकी भाषा में “हम” नहीं होता है, केवल “मैं” होता है। “मैंने अमेरिका को बचाया।” “मैंने दुनिया को सबक सिखाया।” “मेरे बिना अमेरिका कुछ नहीं।” यह भाषा नेतृत्व की नहीं, नार्सिसिज्म की है। उनके लिए व्हाइट हाउस शासन का केंद्र नहीं, एक ऐसा मंच है जहाँ से वे पूरी दुनिया को अपनी “छवि” दिखा सकते हैं।

किसी भी लोकतंत्र में आलोचना सत्ता का संतुलन होती है। लेकिन ट्रंप के लिए आलोचना शत्रुता है। मीडिया उन्हें “फेक न्यूज” लगता है। न्यायपालिका “षड्यंत्रकारी” लगती है। विपक्ष “देशद्रोही” प्रतीत होता है और सहयोगी देश “धोखेबाज” लगते हैं। यह मानसिकता एक निर्वाचित राष्ट्रपति की नहीं, एक ऐसे शासक की है, जो सत्ता को निजी संपत्ति मानता है। वे यह स्वीकार नहीं कर पाते हैं कि कोई उनसे असहमत हो सकता है और फिर भी देशभक्त रह सकता है। उनके संसार में केवल दो वर्ग हैं समर्थक और शत्रु।

ट्रंप की भाषा कूटनीति की नहीं, युद्ध की है। उनके शब्दों में व्यंग्य है। अपमान है। धमकी है। उपहास है। वे वाक्यों से पुल नहीं बनाते, वे वाक्यों से दीवारें खड़ी करते हैं। जब कोई राष्ट्राध्यक्ष दूसरे देश के नेता को “कमजोर”, “अयोग्य” या “मूर्ख” कहता है, तो वह केवल व्यक्ति का नहीं, पूरे राष्ट्र का अपमान करता है। ट्रंप को यह अंतर या तो समझ में नहीं आता है या वे जानबूझकर इस अंतर को नजरअंदाज करते हैं।

ट्रंप का व्यक्तित्व केवल अहंकार से नहीं बना है, उसमें गहरी असुरक्षा भी है। यही कारण है कि वे हर समय अपनी “जीत” गिनाते रहते हैं। वे हर मंच पर स्वयं की प्रशंसा चाहते हैं। वे हर आलोचना को षड्यंत्र मानते हैं। जो व्यक्ति स्वयं से संतुष्ट होता है, उसे हर समय स्वयं को साबित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। लेकिन ट्रंप को पड़ती है। उनका आत्मविश्वास शांत नहीं है आक्रामक है। यह वह आत्मविश्वास है जो हर असहमति को अपमान मान लेता है।

ट्रंप के पहले वर्ष में अमेरिका के भीतर भी एक नई प्रवृत्ति दिखी- राज्य से अधिक व्यक्ति की पूजा। उनके समर्थकों के लिए देश ट्रंप है। आलोचना देशद्रोह है और संस्थाएँ बाधा हैं। यह लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है। क्योंकि लोकतंत्र संस्थाओं से चलता है, व्यक्तियों से नहीं। जब व्यक्ति संस्था से बड़ा हो जाए, तो लोकतंत्र राजतंत्र बनने लगता है। ट्रंप की राजनीति यही संकेत देती है।

अब सोचनीय विषय है कि जब ऐसा व्यक्ति सिर्फ अमेरिका का नहीं, पूरी दुनिया का सबसे शक्तिशाली पद संभाल ले तो क्या होगा? कूटनीति भावुक हो जाएगी? निर्णय व्यक्तिगत हो जाएँगे? नीतियाँ स्थायी नहीं रहेंगी? विश्व व्यवस्था अस्थिर हो जाएगी? जबकि ट्रंप का पहला वर्ष यही दिखाता है। उनके लिए राष्ट्र हित और निजी छवि एक ही हो गया है। विदेश नीति और चुनावी राजनीति घुल-मिल गई है। वैश्विक संकट घरेलू प्रचार का साधन बन गए हैं। यह नेतृत्व नहीं, यह सत्ता का निजीकरण प्रतीत होता है।

इतिहास किसी को उसके पद से नहीं, उसके प्रभाव से याद रखता है। डोनाल्ड ट्रंप का प्रभाव दुनिया में विभाजन। भाषा में कटुता। राजनीति में असभ्यता। कूटनीति में असंतुलन। वे केवल अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं, वे वैश्विक राजनीति की स्वर-लिपि बदल रहे हैं और यह स्वर सद्भाव का नहीं, संघर्ष का है।
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