कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार के अंतर्गत भारतीय नृत्य कला मंदिर, पटना के सौजन्य से आयोजित “भिखारी ठाकुर स्मृति समारोह” का शुभारंभ आज गरिमामय एवं भावपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/कार्यक्रम की शुरुआत भारतीय नृत्य कला मंदिर की प्रशासी पदाधिकारी सुश्री कहकशां तथा संगोष्ठी में उपस्थित विद्वान वक्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन कर की गई।
इस अवसर पर भारतीय नृत्य कला मंदिर की प्रशासी पदाधिकारी सुश्री कहकशां ने अपने स्वागत संबोधन में कहा कि लोकनायक भिखारी ठाकुर ने सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने अपने नाटकों और गीतों के माध्यम से समाज को जागरूक करने का जो कार्य किया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रेरणादायी है। उन्होंने भिखारी ठाकुर के जीवन, संघर्ष और उनके सामाजिक अवदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।
सांस्कृतिक कार्यक्रम की पहली प्रस्तुति युवा कलाकार पूजा उपाध्याय द्वारा दी गई। उन्होंने भिखारी ठाकुर की समृद्ध गीत परंपरा में कजरी सहित अन्य लोकगीतों की भावपूर्ण प्रस्तुति देकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। उनकी प्रस्तुति से पूरा सभागार “भिखारीमय” हो उठा और स्मृति समारोह लोक रंगों से सराबोर हो गया।
इसके उपरांत आयोजित संगोष्ठी में सर्वप्रथम प्रख्यात साहित्यकार, लोकगायक एवं संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. शंकर प्रसाद ने भिखारी ठाकुर की समसामयिक प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जो रचना दो सौ वर्षों बाद भी स्मरण की जाती है, वही सच्चे अर्थों में कालजयी और प्रासंगिक होती है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि शेक्सपियर के नाटकों में गीतों की महत्ता को देखते हुए राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी ठाकुर को “भोजपुरी का शेक्सपियर” कहा था, जो उनके रचनात्मक कद और व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।
दूसरे वक्ता डॉ. सुमन कुमार ने भिखारी ठाकुर की नाट्य शैली पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नाट्य के प्रति गहरे प्रेम के कारण उन्होंने प्रारंभ में विभिन्न स्थानों पर जाकर रामलीला का प्रशिक्षण दिया। किंतु समाज में व्याप्त बुराइयों की पीड़ा को रामलीला के माध्यम से पूर्ण रूप से अभिव्यक्त न कर पाने के कारण उन्होंने अपनी स्वतंत्र नाट्य मंडली का गठन किया। इस नाट्य मंडली के माध्यम से उन्होंने कुरीतियों, शोषण और सामाजिक असमानता के विरुद्ध जन-जागरण का कार्य किया और अपने संदेश को गांव-गांव तक पहुंचाया।
तीसरे वक्ता डॉ. रणजीत कुमार ने भिखारी ठाकुर के जीवन और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके नाटकों के नाम और पात्र उनके अंतर्मन को प्रतिबिंबित करते हैं। उनके नाटकों में आत्मा और परमात्मा के विरह का गहन दार्शनिक भाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।
इस अवसर पर प्रख्यात लोकगायक मनोरंजन ओझा ने कहा कि अपने साथियों के साथ भैंस चराते हुए गीत गाने वाले भिखारी ठाकुर का “भोजपुरी के शेक्सपियर” के रूप में प्रतिष्ठित होना उनकी साधना, संघर्ष और प्रतिभा का प्रमाण है। यह यात्रा उन्हें और अधिक प्रासंगिक तथा प्रेरणादायी बनाती है।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में भिखारी ठाकुर की परंपरा आधारित गायन प्रस्तुत करते हुए कलाकार अभिषेक राज ने अपनी सुमधुर प्रस्तुति से संध्या को और भी स्मरणीय बना दिया।
समारोह के अंत में उपस्थित अतिथियों, कलाकारों एवं श्रोताओं ने भिखारी ठाकुर के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक योगदान को स्मरण करते हुए उनके विचारों को आज के समाज में आत्मसात करने का संकल्प लिया। स्मृति समारोह का समापन अत्यंत भावपूर्ण वातावरण में हुआ।


