ताजा खबर

*भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना है – “अनंत चतुर्दशी”*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा,  ::भारतीय सनातन परंपरा में पर्व केवल तिथि और अनुष्ठान का नाम नहीं हैं। प्रत्येक पर्व अपने भीतर जीवन को दिशा देने वाला कोई न कोई आध्यात्मिक संदेश समेटे होता है। इन्हीं पर्वों में एक महत्वपूर्ण पर्व है “अनंत चतुर्दशी”, जिसे भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के ‘अनंत स्वरूप’ की आराधना को समर्पित है। ‘अनंत’ अर्थात जिसका न आदि है और न अंत। इसलिए यह पर्व मनुष्य को उस सनातन सत्ता की याद दिलाता है, जो समय, परिस्थितियों और सीमाओं से परे मानी जाती है।

इस वर्ष अनंत चतुर्दशी का पर्व 25 सितंबर को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 24 सितंबर की रात 11 बजकर 18 मिनट से प्रारंभ होकर 25 सितंबर की रात 11 बजकर 6 मिनट तक रहेगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्रत और पूजन 25 सितंबर को ही किया जाएगा। पूजा के लिए शुभ समय सुबह 6 बजकर 28 मिनट से रात 11 बजकर 6 मिनट तक बताया गया है।

भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है। अनंत चतुर्दशी पर उनका अनंत स्वरूप विशेष रूप से पूजित होता है। धार्मिक परंपरा में ‘अनंत’ केवल भगवान विष्णु का एक नाम नहीं है, बल्कि उस शाश्वत सत्ता का प्रतीक है जिसका कोई आरंभ और अंत निर्धारित नहीं किया जा सकता है। मनुष्य का जीवन सीमाओं से बंधा हुआ है। जन्म और मृत्यु के बीच का समय सीमित है। इच्छाएं अनंत हैं, लेकिन साधन सीमित। सुख आता-जाता है और कठिनाइयां भी स्थायी नहीं रहती है। ऐसे में अनंत भगवान की पूजा मनुष्य को उस शाश्वत तत्व की ओर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देती है, जो परिवर्तनशील संसार के बीच स्थिरता का प्रतीक है। इसी भाव के साथ श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और अपने जीवन में सुख, शांति, समृद्धि तथा संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं।

अनंत चतुर्दशी की पूजा का सबसे प्रमुख आकर्षण है 14 गांठों वाला अनंत सूत्र। परंपरा के अनुसार, श्रद्धालु अनंत सूत्र तैयार करते हैं। पूजा के बाद इसे भगवान विष्णु को अर्पित किया जाता है और फिर पुरुष इसे सामान्यतः दाहिनी तथा महिलाएं बाईं भुजा में धारण करती हैं। इस सूत्र में बनी 14 गांठें अत्यंत प्रतीकात्मक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ये 14 लोकों का प्रतिनिधित्व करती हैं। “इन लोकों के नाम है- अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल, भू, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य”। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में लोकों के नामों के क्रम अथवा विवरण में कुछ अंतर मिल सकता है। फिर भी अनंत सूत्र की 14 गांठों को 14 लोकों का प्रतीक मानने की परंपरा व्यापक रूप से प्रचलित है। अनंत सूत्र का उद्देश्य केवल इसे धागे के रूप में बांध लेना नहीं है। इसके पीछे यह भाव है कि मनुष्य स्वयं को भगवान विष्णु की शरण में समर्पित करे और जीवन में धर्म, संयम, सत्य तथा सदाचार का पालन करने का संकल्प ले।

सनातन चिंतन में ब्रह्मांड की संरचना को समझाने के लिए अनेक प्रतीक और अवधारणाएं मिलती हैं। 14 लोकों की अवधारणा भी उसी व्यापक दार्शनिक परंपरा का हिस्सा है। एक ओर अधोलोकों की कल्पना है तो दूसरी ओर उच्च लोकों की। इनके माध्यम से अस्तित्व के विभिन्न स्तरों की कल्पना की गई है। अनंत सूत्र की 14 गांठें इसी व्यापक ब्रह्मांडीय अवधारणा को स्मरण कराने वाली मानी जाती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो हाथ पर बंधा हुआ सूत्र व्यक्ति को लगातार यह स्मरण कराता है कि उसका जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-दुख तक सीमित नहीं है। उसके कर्म, आचरण और विचार भी व्यापक सृष्टि-व्यवस्था का हिस्सा हैं। धागा शरीर पर दिखाई देता है, लेकिन उसका संदेश मन के भीतर उतरने के लिए है।

अनंत चतुर्दशी से जुड़ी सबसे लोकप्रिय धार्मिक कथाओं में महाभारत काल की कथा प्रमुख है। मान्यता के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना राज्य और वैभव गंवाकर वनवास में भटक रहे थे, तब उनके सामने जीवन की कठिन परिस्थितियां थी। ऐसे समय में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को अनंत भगवान की आराधना और व्रत का महत्व बताया। श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत भगवान विष्णु की उपासना करने की सलाह दी। धार्मिक परंपरा के अनुसार पांडवों ने विधिपूर्वक अनंत व्रत किया और बाद में उन्हें अपना खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त हुआ। इसी कथा के आधार पर यह मान्यता प्रचलित हुई कि अनंत भगवान की आराधना विपरीत परिस्थितियों में आशा और विश्वास प्रदान करती है तथा जीवन में खोई हुई स्थिरता की पुनर्प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। हालांकि महाभारत से जुड़ी धार्मिक कथाओं को श्रद्धा और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए। इनका मूल उद्देश्य केवल घटनाओं का वर्णन करना नहीं, बल्कि धर्म, धैर्य, विश्वास और ईश्वर-समर्पण जैसे जीवन-मूल्यों को स्थापित करना है।

अनंत चतुर्दशी की कथा का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि संकट के समय मनुष्य को अपने विश्वास और धैर्य को नहीं छोड़ना चाहिए। पांडवों के जीवन में भी ऐसा समय आया जब उनके पास राजपाट नहीं था। उन्हें वनवास का कष्ट सहना पड़ा। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों को अंतिम सत्य नहीं माना। श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन मिला और उन्होंने धार्मिक आस्था के साथ अपने कर्तव्य का पालन जारी रखा। इसलिए अनंत व्रत केवल सुख और समृद्धि की कामना का पर्व नहीं है। यह कठिन समय में धैर्य रखने और अपने उद्देश्य से विचलित न होने का भी प्रतीक माना जा सकता है।

अनंत सूत्र को लेकर एक सुंदर आध्यात्मिक भाव यह भी है कि यह मनुष्य को भगवान से जोड़ने वाला प्रतीकात्मक बंधन है। परंपरा में यह भाव मिलता है कि 14 गांठों वाला सूत्र भगवान विष्णु को समर्पित कर धारण करने का अर्थ है- मनुष्य अपने जीवन को अनंत परमात्मा के संरक्षण और अनुशासन से जोड़ रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान को भौतिक रूप से किसी बंधन में बांधा जा सकता है। यह एक प्रतीकात्मक धार्मिक भावना है। वास्तव में सूत्र मनुष्य को ही उसके धर्म, संकल्प और आस्था से बांधता है। जिस हाथ में अनंत सूत्र बंधता है, वही हाथ सेवा कर सकता है, दान दे सकता है, किसी जरूरतमंद की सहायता कर सकता है और अपने कर्मों के माध्यम से धर्म का पालन कर सकता है। इस अर्थ में सूत्र का वास्तविक महत्व उसके धागे में नहीं, बल्कि उससे जुड़े संकल्प में है।

अनंत चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। पूजा स्थल को स्वच्छ कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। इसके बाद विधि-विधान के अनुसार पूजा, मंत्र-जप, कथा श्रवण और अनंत सूत्र की पूजा की जाती है। क्षेत्र, परिवार और परंपरा के अनुसार पूजा की विधि में अंतर हो सकता है। कहीं विशेष परसाद बनाया जाता है, कहीं अनंत भगवान की कथा सुनाई जाती है और कहीं परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा करते हैं। भारतीय पर्वों की यही विशेषता है कि उनकी मूल भावना एक होती है, लेकिन उनकी लोकपरंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप ले लेती है।

अनंत चतुर्दशी का एक सामाजिक पक्ष भी है। आज के समय में जब परिवार के सदस्य अपने-अपने काम में व्यस्त रहते हैं, ऐसे पर्व परिवार को एक साथ बैठने, पूजा करने और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर देते हैं। बुजुर्ग बच्चों को बताते हैं कि अनंत सूत्र की 14 गांठों का क्या अर्थ है। कथा सुनाई जाती है। पूजा की सामग्री तैयार की जाती है। परसा बनता है और पूरा परिवार धार्मिक वातावरण में सहभागी बनता है। इस प्रकार पर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं रहता है। वह पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद का माध्यम भी बन जाता है।

जीवन में मनुष्य धन, पद, प्रतिष्ठा, संबंध और संपत्ति को स्थायी समझने की भूल करता है। समय बदलता है तो परिस्थितियां बदल जाती है। कल जो व्यक्ति शक्तिशाली था, आज सामान्य स्थिति में हो सकता है। कल जिसके पास कुछ नहीं था, वह आज समृद्ध हो सकता है। अनंत चतुर्दशी इस परिवर्तनशील संसार के बीच ‘अनंत’ की अवधारणा को सामने रखती है। यह पर्व मनुष्य से पूछता है कि यदि संसार की हर वस्तु परिवर्तनशील है तो फिर उसके जीवन का स्थायी आधार क्या है? सनातन परंपरा इसका उत्तर ईश्वर, धर्म, सत्य और सदाचार में खोजती है। इसीलिए अनंत व्रत को केवल मनोकामना पूरी करने का साधन मानने के बजाय आत्मचिंतन का अवसर भी माना जा सकता है।

आज जीवन की गति तेज है। तनाव, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव और पारिवारिक व्यस्तताएं मनुष्य को लगातार प्रभावित करती है। ऐसे समय में अनंत चतुर्दशी का पर्व मनुष्य को कुछ क्षण ठहरने और अपने भीतर झांकने का अवसर देता है। अनंत सूत्र की गांठें मानो कहती हैं कि जीवन की समस्याओं को एक-एक करके सुलझाया जा सकता है। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, विश्वास और धैर्य का धागा टूटना नहीं चाहिए। भगवान विष्णु का अनंत स्वरूप संरक्षण और संतुलन की भावना का प्रतीक है। इसलिए इस पर्व की सार्थकता तभी है जब पूजा के साथ जीवन में भी संतुलन, संयम, सत्य और करुणा का स्थान बढ़े।

25 सितंबर को जब श्रद्धालु अनंत भगवान की पूजा करेंगे और अपनी भुजा पर 14 गांठों वाला अनंत सूत्र धारण करेंगे, तब वह केवल एक धार्मिक परंपरा का निर्वाह नहीं होगा। वह हजारों वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ने का अवसर भी होगा। 14 गांठें 14 लोकों की स्मृति दिलाएंगी। भगवान विष्णु का अनंत स्वरूप जीवन की सीमाओं से परे शाश्वत सत्ता का बोध कराएगा। पांडवों की कथा संकट में धैर्य का संदेश देगी और अनंत सूत्र मनुष्य को अपने संकल्प की याद दिलाएगा। अनंत चतुर्दशी इसलिए केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि अनंत विश्वास का पर्व है। यह हमें बताती है कि परिस्थितियां बदल सकती हैं, सुख-दुख आते-जाते रह सकते हैं, सत्ता और संपत्ति स्थायी नहीं हैं, लेकिन सत्य, धर्म, आस्था और सदाचार के प्रति मनुष्य का संकल्प उसके जीवन को अर्थ प्रदान कर सकता है। इसी विश्वास के साथ अनंत भगवान की आराधना की जाती है, परिवार में सुख-शांति हो, जीवन में समृद्धि आए, संकटों का सामना करने की शक्ति मिले और मनुष्य का जीवन धर्म तथा सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे। अनंत भगवान विष्णु की यह उपासना अंततः बाहरी समृद्धि से अधिक भीतर की स्थिरता और विश्वास का पर्व बन जाती है। यही अनंत चतुर्दशी की सबसे बड़ी आध्यात्मिक विशेषता है।
————

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button