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*धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर विपक्ष की सक्रियता ने खोली – भारतीय राजनीति के दोहरे मापदंडों की पोल*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा,  ::भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहां आस्था भी अक्सर विचारधारा और चुनावी गणित के तराजू पर तौली जाती है। भगवान राम, कृष्ण और शिव के प्रति श्रद्धा कितनी है, यह कई बार व्यक्ति की धार्मिक भावना से अधिक उसकी राजनीतिक पहचान के आधार पर निर्धारित होने लगती है। किसे राम का नाम लेना चाहिए, कौन कृष्ण का भक्त हो सकता है और किसे शिव की आराधना का अधिकार है, इसका फैसला भी मानो राजनीतिक दलों के कार्यालयों में होने लगा है। कभी पर्दे के पीछे आस्था का सौदा होता था, लेकिन अब तो छाती ठोककर कहा जाने लगा है कि यह भगवान उनके हैं और वह भगवान इनके हैं। सवाल यह है कि क्या सनातन परंपरा किसी राजनीतिक दल की जागीर है? क्या भगवान राम, कृष्ण और शिव की आराधना के लिए भी किसी विचारधारा की सदस्यता आवश्यक है?

इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का हालिया बयान और उसके बाद शुरू हुआ विवाद कई मायनों में दिलचस्प है। शास्त्री की कथा के दौरान भगवान राम और भगवान कृष्ण की तुलना को लेकर उठे सवालों ने एक नया राजनीतिक विमर्श खड़ा कर दिया है। उनके कथन को लेकर आपत्ति जताई गई, आलोचना हुई और कांग्रेस से जुड़े लोगों की ओर से पुलिस में शिकायत तक पहुंचने की खबरें सामने आई। यह अपने आप में असामान्य नहीं है कि किसी धार्मिक वक्ता के बयान पर विवाद हो। सार्वजनिक जीवन में आने वाले हर व्यक्ति के कथन की समीक्षा और आलोचना हो सकती है। लेकिन इस पूरे प्रकरण की सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस विपक्ष पर अक्सर सनातन और हिन्दू आस्था के प्रश्नों पर राजनीतिक असहजता के आरोप लगते रहे हैं, उसके कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अचानक राम-कृष्ण के प्रति अपनी निष्ठा का सार्वजनिक प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

धीरेंद्र शास्त्री अपने बयानों, कथाओं और सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर पहले भी चर्चा में रहे हैं। उनके समर्थकों की बड़ी संख्या है तो आलोचकों का एक वर्ग भी है, जो उनके वक्तव्यों और दावों पर प्रश्न उठाता रहा है। किसी भी कथावाचक को आलोचना से परे नहीं माना जा सकता। धार्मिक मंच पर बोले गए शब्दों का प्रभाव सामान्य राजनीतिक भाषण से कहीं अधिक व्यापक होता है। इसलिए वक्ता की जिम्मेदारी भी अधिक हो जाती है।

भगवान राम और कृष्ण भारतीय जनमानस के आराध्य हैं। दोनों के व्यक्तित्व, जीवन-दर्शन और लीलाओं की अपनी विशिष्टता है। राम मर्यादा, त्याग, कर्तव्य और आदर्श शासन के प्रतीक हैं तो कृष्ण जीवन की जटिलताओं के बीच धर्म, कर्म, नीति और लोककल्याण का मार्ग दिखाते हैं। दोनों की तुलना किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ या निम्न साबित करने के लिए करना उचित नहीं कहा जा सकता है। दोनों के दर्शन को समझने के लिए उनके युग, परिस्थितियों और संदेशों को समझना जरूरी है। इसलिए यदि धीरेंद्र शास्त्री के कथन में तुलनात्मक प्रस्तुति को लेकर आपत्ति है तो उस पर तार्किक और शास्त्रीय विमर्श होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि इस आपत्ति की तीव्रता का कारण केवल धार्मिक भावना है या इसके पीछे कोई राजनीतिक अवसर भी दिखाई देता है? क्या यही संवेदनशीलता हर उस अवसर पर दिखाई देती है, जब किसी अन्य मंच से हिन्दू देवी-देवताओं, धार्मिक प्रतीकों अथवा सनातन परंपराओं को लेकर विवादास्पद टिप्पणियां की जाती है?

इस पूरे घटनाक्रम का एक सकारात्मक पक्ष भी है। यदि धीरेंद्र शास्त्री के बयान के बाद कांग्रेस और विपक्ष के नेताओं को भगवान राम और कृष्ण के सम्मान की चिंता हुई है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। भगवान किसी दल के नहीं होते। उनकी मर्यादा और महिमा का सम्मान करने का अधिकार प्रत्येक भारतीय को है। किसी राजनीतिक दल का नेता हो या सामान्य नागरिक, आस्था व्यक्त करने के लिए किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। लेकिन इस स्वागत के साथ एक सवाल भी जुड़ा है। क्या यह निष्ठा स्थायी है या परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है? क्या राम और कृष्ण के प्रति सम्मान केवल तब जागता है, जब किसी धार्मिक वक्ता के बयान को राजनीतिक रूप से चुनौती देने का अवसर मिलता है? क्या धार्मिक भावनाओं की रक्षा का सिद्धांत सभी परिस्थितियों में समान रूप से लागू होता है?

विडंबना देखिए कि जिस राजनीतिक वातावरण में राम मंदिर आंदोलन से लेकर रामलला की प्राण प्रतिष्ठा तक पर दलों के बीच अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिली है, उसी वातावरण में अब भगवान राम और कृष्ण के सम्मान को लेकर विपक्षी नेताओं की सक्रियता सामने आ रही है। इसे भारतीय लोकतंत्र में धार्मिक अभिव्यक्ति की व्यापकता के रूप में भी देखा जा सकता है, लेकिन यदि यह सक्रियता केवल राजनीतिक विरोध का औजार बनती है तो इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर आस्था कोई मौसमी फसल तो नहीं है, जो चुनावी मौसम में लहलहाने लगे और राजनीतिक आवश्यकता समाप्त होते ही सूख जाए। श्रद्धा का संबंध व्यक्ति के अंतर्मन से होता है, न कि राजनीतिक रणनीतिकारों की बैठकों से।

भारतीय समाज में भगवान राम का स्थान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। वे भारतीय संस्कृति, लोकजीवन, साहित्य, कला और नैतिक चेतना के अभिन्न अंग हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक रामकथा के अनेक रूप मिलते हैं। कहीं राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, कहीं लोकनायक, कहीं आराध्य और कहीं आदर्श पुत्र, पति तथा राजा के प्रतीक। इसी तरह भगवान कृष्ण का व्यक्तित्व भी किसी एक धार्मिक व्याख्या में सीमित नहीं है। वे बाललीला के कान्हा हैं, गोपियों के प्रिय हैं, अर्जुन के सारथी हैं और गीता के माध्यम से कर्मयोग का संदेश देने वाले योगेश्वर भी हैं। उनका जीवन बताता है कि धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने का साहस भी है।

भगवान शिव तो और भी व्यापक लोकआस्था के प्रतीक हैं। वे संहारक भी हैं और कल्याणकारी भी। वे वैराग्य के प्रतीक हैं तो गृहस्थ जीवन के भी। उनकी उपासना किसी राजनीतिक सीमा में नहीं बंधी है। ऐसे में राम, कृष्ण और शिव को राजनीतिक खेमों में बांटने का प्रयास हमारी सांस्कृतिक परंपरा की मूल भावना के विरुद्ध है। जो राम को मानता है, वह कृष्ण का भी सम्मान कर सकता है। जो शिव का उपासक है, वह किसी अन्य देव परंपरा का भी आदर कर सकता है। सनातन की व्यापकता ही उसकी शक्ति है। यहां विविधता विरोध नहीं है, बल्कि सहअस्तित्व का आधार है।

लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक है। किसी कथावाचक, संत, धर्मगुरु, राजनेता या सार्वजनिक व्यक्ति को इस अधिकार से मुक्त नहीं किया जा सकता है। धार्मिक मंचों पर कही गई बातों की भी समीक्षा होनी चाहिए। यदि कोई वक्तव्य धार्मिक भावनाओं को आहत करता है, तथ्यात्मक रूप से गलत है या समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा करता है तो उस पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। लेकिन आलोचना का आधार व्यक्ति की राजनीतिक पहचान नहीं है, बल्कि उसके कथन की प्रकृति होनी चाहिए। यदि किसी एक व्यक्ति के बयान पर धार्मिक भावनाओं की रक्षा के नाम पर पुलिस तक पहुंचा जाता है तो समान प्रकृति के दूसरे बयानों पर भी वैसी ही संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए।

राजनीति में यही दोहरा मापदंड सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है। एक पक्ष के बयान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया जाता है और दूसरे पक्ष के बयान को धार्मिक अपमान। एक व्यक्ति की टिप्पणी को मजाक कहकर टाल दिया जाता है तो दूसरे की टिप्पणी पर कानूनी कार्रवाई की मांग होने लगती है। इससे न तो धार्मिक सौहार्द मजबूत होता है और न लोकतांत्रिक संवाद। कानून का अपना दायरा है। शिकायत करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन शिकायत का होना किसी आरोप को स्वतः प्रमाणित नहीं कर देता। उसकी जांच तथ्यों और कानून के आधार पर होनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति को राजनीतिक विरोध के कारण दोषी घोषित करना उचित नहीं है।

सनातन परंपरा का मूल भाव व्यापकता, सहिष्णुता और संवाद में दिखाई देता है। यहां प्रश्न पूछने, व्याख्या करने और अलग-अलग दृष्टिकोण रखने की परंपरा रही है। उपनिषदों के संवाद से लेकर गीता के उपदेश तक, भारतीय दर्शन में जिज्ञासा और विवेक को महत्व दिया गया है। इसलिए किसी धार्मिक वक्ता के कथन से असहमति रखना सनातन विरोध नहीं है। उसी तरह किसी संत या कथावाचक का समर्थन करना भी किसी राजनीतिक दल का समर्थक होने का प्रमाण नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब धर्म को राजनीतिक सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया जाने लगता है। कभी मंदिर और भगवान के नाम पर समर्थन जुटाया जाता है, कभी उन्हीं प्रतीकों से दूरी बनाकर एक विशेष राजनीतिक वर्ग को साधने का प्रयास होता है। कभी धार्मिक पहचान को चुनावी मंच पर प्रमुखता दी जाती है तो कभी उसे निजी मामला बताकर सार्वजनिक विमर्श से बाहर रखने की कोशिश होती है।

यह दोहरा व्यवहार किसी एक दल तक सीमित नहीं है। भारतीय राजनीति में लगभग सभी दलों ने समय-समय पर धर्म और आस्था को अपनी राजनीतिक रणनीति के अनुरूप इस्तेमाल किया है। अंतर केवल इतना है कि किसी दल के लिए धार्मिक प्रतीक उसकी पहचान का हिस्सा बन जाते हैं तो किसी दूसरे दल के लिए वही प्रतीक राजनीतिक असहजता का कारण बन जाते हैं। यही वह स्थिति है जहां मतदाता को भी सावधान रहने की जरूरत है। उसे यह देखना चाहिए कि राजनीतिक दलों की आस्था केवल भाषणों में है या उनके व्यवहार, सामाजिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक सम्मान में भी दिखाई देती है।

इस पूरे विवाद में एक व्यंग्यात्मक पहलू भी है। धीरेंद्र शास्त्री के बयान ने अनायास ही विपक्ष के कुछ नेताओं को राम और कृष्ण के सम्मान की बात सार्वजनिक रूप से करने का अवसर दे दिया। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि उन्होंने राजनीतिक विरोधियों को भी भगवान राम और कृष्ण के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने के लिए प्रेरित कर दिया। यदि इस बहाने धार्मिक आस्था के प्रति सम्मान का भाव व्यापक होता है तो इसे सकारात्मक रूप में ही देखना चाहिए। लेकिन इस प्रसंग को केवल राजनीतिक व्यंग्य तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। धीरेंद्र शास्त्री को भी यह समझना चाहिए कि लाखों लोगों की आस्था से जुड़े मंच पर शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी से होना चाहिए। लोकप्रियता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। किसी धार्मिक प्रतीक की व्याख्या करते समय शास्त्रीय संदर्भ, लोकमान्यता और भावनात्मक संवेदनशीलता का ध्यान रखना जरूरी है।

संत, कथावाचक और धर्मगुरु समाज को जोड़ने का काम करें, न कि अनावश्यक तुलना के माध्यम से विवादों को जन्म दें। उनकी लोकप्रियता का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उससे समाज में सद्भाव, नैतिकता और सकारात्मकता का विस्तार हो। दूसरी ओर, राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि धार्मिक आस्था पर प्रतिक्रिया देने का अधिकार सबको है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता तभी कायम रहेगी, जब प्रतिक्रिया निष्पक्ष और समान हो।

अब इस पूरे प्रकरण के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारतीय राजनीति में सिद्धांत वास्तव में स्थायी हैं या विरोध की स्याही से लिखे जाते हैं? क्या समर्थन और विरोध की कसौटी विचारधारा है या केवल राजनीतिक सुविधा? क्या धार्मिक भावनाओं का सम्मान एक सार्वभौमिक मूल्य है या सत्ता और विपक्ष के बीच चलने वाला सुविधाजनक राजनीतिक खेल? लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्वाभाविक है। सत्ता पक्ष की आलोचना विपक्ष का दायित्व है और विपक्ष की आलोचना करना सत्ता पक्ष का अधिकार। लेकिन जब हर विषय को राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगे तो समाज के बुनियादी प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महंगाई और विकास जैसे मुद्दों पर सार्थक बहस की जगह धार्मिक प्रतीकों और बयानों पर राजनीतिक संघर्ष अधिक दिखाई देने लगता है। इससे सबसे बड़ा नुकसान आस्था को होता है। क्योंकि आम आदमी के लिए भगवान राम, कृष्ण और शिव चुनावी नारे नहीं है, जीवन के विश्वास है। वह राम में मर्यादा देखता है, कृष्ण में कर्मयोग और शिव में कल्याण का भाव। उसकी श्रद्धा किसी दल के घोषणापत्र से पैदा नहीं होती और न ही किसी राजनीतिक विवाद से समाप्त होती है। राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने का दावा केवल तब तक प्रभावी नहीं रह सकता, जब तक वह विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता रहे। असली परीक्षा तब होती है, जब वही कसौटी अपने समर्थकों और अपने नेताओं पर भी लागू की जाए।

भारत की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविधता और धार्मिक सहअस्तित्व में निहित है। यहां मंदिरों की घंटियां, मस्जिदों की अजान, गुरुद्वारों की अरदास और गिरजाघरों की प्रार्थनाएं एक ही सामाजिक परिवेश का हिस्सा है। इस देश की आत्मा किसी एक राजनीतिक दल के पास सुरक्षित नहीं है। उसी तरह भगवान राम, कृष्ण और शिव भी किसी दल, संगठन या विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं है। आस्था को राजनीतिक सुविधा के तराजू पर तौलने के बजाय उसे व्यक्तिगत विश्वास और सामाजिक सद्भाव का विषय रहने देना चाहिए। धार्मिक वक्ताओं को अपनी भाषा में संयम रखना चाहिए और राजनीतिक दलों को अपनी प्रतिक्रियाओं में ईमानदारी। असहमति हो तो तर्क से हो, आलोचना हो तो समान मापदंड से हो और शिकायत हो तो कानून के दायरे में हो।

प्रश्न यह नहीं है कि धीरेंद्र शास्त्री ने किसकी तुलना किससे कर दी या कांग्रेस ने उनके बयान पर क्या प्रतिक्रिया दी। असली प्रश्न यह है कि क्या हम अपने धार्मिक विश्वासों को राजनीतिक चश्मे से देखना बंद कर पाएंगे? क्या राम का नाम लेने वाला व्यक्ति पहले किसी राजनीतिक खेमे में अपनी जगह तय करेगा? क्या कृष्ण के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने से पहले किसी को यह सोचना पड़ेगा कि उसकी बात से किस दल को लाभ या नुकसान होगा? राम सबके हैं, कृष्ण सबके हैं और शिव भी सबके हैं। उनकी महिमा राजनीतिक सीमाओं से कहीं बड़ी है। राजनीति को आस्था से मर्यादा सीखनी चाहिए, न कि आस्था को राजनीति से अपनी पहचान का प्रमाणपत्र लेना चाहिए। क्योंकि भगवान के दरबार में न सत्ता पक्ष होता है, न विपक्ष। वहां केवल श्रद्धा, कर्म और सत्य का महत्व है और लोकतंत्र की भी यही खूबसूरती होनी चाहिए कि विचारों का विरोध हो, व्यक्तियों की आलोचना हो, लेकिन आस्था को राजनीतिक स्वार्थ की कठपुतली न बनाया जाए।
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