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अमीरी में पले बढ़े तेजस्वी को गरीब कार्यकर्ताओं की परवाह नहीं – डा0 निहोरा प्रसाद यादव

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/जद (यू0) प्रदेश प्रवक्ता डा0 निहोरा प्रसाद यादव ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव पर तंज कसते हुए कहा कि जो व्यक्ति बचपन से सत्ता, सुविधाओं और शाही माहौल में पला-बढ़ा हो, उससे गरीब कार्यकर्ताओं की पीड़ा समझने की उम्मीद करना ही बेमानी है। आज तेजस्वी यादव भले ही अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए खुद को गरीब परिवार का बेटा बताने की कोशिश करें, लेकिन बिहार की जनता अच्छी तरह जानती है कि उनका पूरा जीवन विशेषाधिकारों और ऐशो-आराम के बीच बीता है।
तेजस्वी यादव को राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए न संघर्ष करना पड़ा, न जनता के बीच वर्षों तक पसीना बहाना पड़ा और न ही संगठन खड़ा करने की मेहनत करनी पड़ी। उन्हें अपने पिता की तैयार राजनीतिक विरासत आसानी से मिल गई। यही कारण है कि आज भी उन्हें पार्टी के उन हजारों कार्यकर्ताओं की मेहनत और समर्पण का मूल्य समझ में नहीं आता, जिनके बूते कोई भी राजनीतिक दल मजबूत होता है। उन्होंने कहा कि आरजेडी का स्थापना दिवस 5 जुलाई को होता रहा है लेकिन 5 जुलाई के पहले स्थापना दिवस इसलिए मनाया गया चूंकि तेजस्वी यादव को भ्रमण पर जाना है।
आरजेडी के स्थापना दिवस के अवसर पर उनकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता द्वारा सार्वजनिक मंच से यह कहना कि तेजस्वी यादव कार्यकर्ताओं से मिलने तक का समय नहीं निकालते, इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि पार्टी के भीतर भी उनके व्यवहार को लेकर नाराजगी है। जब अपने ही नेता खुलेआम ऐसी बातें कह रहे हैं तो यह स्पष्ट है कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा आरजेडी की आंतरिक सच्चाई बन चुकी है।
उन्होंने कहा कि बिहार के दूर-दराज गांवों से गरीब कार्यकर्ता अपनी जेब से खर्च कर पटना आते हैं, कई-कई दिनों तक इंतजार करते हैं, लेकिन उन्हें नेता प्रतिपक्ष से मिलने का अवसर तक नहीं मिलता। निराश होकर उन्हें वापस लौटना पड़ता है। यह स्थिति बताती है कि तेजस्वी यादव की राजनीति केवल मंचों और सोशल मीडिया तक सीमित है, जमीन पर कार्यकर्ताओं के सम्मान और संवाद से उनका कोई सरोकार नहीं है।
उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि आलीशान जीवनशैली के अभ्यस्त तेजस्वी यादव को एसी कमरों से बाहर निकलकर आम कार्यकर्ताओं के बीच बैठना शायद अपनी शान के खिलाफ लगता है। गांव से आने वाले साधारण कार्यकर्ताओं के पसीने की गंध उन्हें बर्दाश्त नहीं होती और संघर्ष की सच्चाई से उनका कभी वास्ता नहीं रहा, इसलिए वे उनसे दूरी बनाकर रखना बेहतर समझते हैं।
तेजस्वी यादव की राजनीतिक विश्वसनीयता पर वैसे भी गंभीर सवाल खड़े हैं। नौकरी के बदले जमीन मामलों में उनका नाम सामने आ चुका है। ऐसे में नैतिकता और संघर्ष की राजनीति का दावा करना केवल जनता को भ्रमित करने का प्रयास है। बिहार की जनता अब परिवारवाद, दिखावे और झूठी सहानुभूति की राजनीति को पूरी तरह पहचान चुकी है और समय आने पर उसका उचित जवाब भी देगी।

 

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