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वायदों की सियासत बनाम हकीकत: ममता के नए मेनिफेस्टो पर उठते सवाल: चंदन चौरसिया

पुराने वादों का अधूरा हिसाब—क्या फिर भरोसा कर पाएगी जनता?

चंदन चौरसिया/घोषणाओं की राजनीति या जमीनी विकास? अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस सरकार पर बढ़ता दबाव

वरिष्ट पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि पश्चिम बंगाल की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है, क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नया चुनावी मेनिफेस्टो जारी किया है। हर चुनाव की तरह इस बार भी बड़े-बड़े वादों और जनकल्याणकारी योजनाओं का खाका पेश किया गया है—रोजगार, महिलाओं की आर्थिक सहायता, युवाओं के लिए अवसर और उद्योगों के विस्तार की बात कही गई है। लेकिन सवाल यही है कि क्या ये वादे नए हैं, या पुराने वादों का ही नया पैकेज? पिछले चुनावों में भी इसी तरह के वादों की लंबी सूची पेश की गई थी—‘युवा शक्ति को रोजगार’, ‘उद्योगों का विस्तार’, ‘शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार’—लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से काफी अलग नजर आई। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि सरकार ने घोषणाओं को प्राथमिकता दी, लेकिन क्रियान्वयन में गंभीर कमी रही। यही कारण है कि बेरोजगारी, पलायन और औद्योगिक ठहराव जैसे मुद्दे आज भी जस के तस बने हुए हैं। आम जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि मेनिफेस्टो अब विकास का रोडमैप नहीं, बल्कि सिर्फ चुनावी दस्तावेज बनकर रह गया है।

अगर पिछले मेनिफेस्टो पर नजर डालें, तो कई अहम वादे अधूरे नजर आते हैं। उद्योग लाने की बात हुई थी, लेकिन कई बड़े निवेश प्रोजेक्ट या तो अटके रहे या राज्य से बाहर चले गए। रोजगार सृजन के दावे किए गए, लेकिन युवा वर्ग आज भी अवसरों की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख कर रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार की बात जरूर हुई, लेकिन जमीनी स्तर पर संसाधनों की कमी, ढांचागत समस्याएं और व्यवस्थागत चुनौतियां बनी रहीं। इसके साथ ही, समय-समय पर भर्ती घोटालों और प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप भी सामने आते रहे, जिन पर विपक्ष ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया। हालांकि सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है, लेकिन जनता के बीच सवाल उठते रहे हैं कि अगर सब कुछ ठीक है, तो फिर समस्याएं खत्म क्यों नहीं हो रही हैं? चंदन चौरसिया के विश्लेषण में यह स्पष्ट होता है कि बार-बार एक ही तरह के वादों को दोहराना और उन्हें पूरा न कर पाना, जनता के भरोसे को कमजोर करता है।

चंदन चौरसिया ने कहा कि नए मेनिफेस्टो में ‘मैन्युफैक्चरिंग’ और औद्योगिक विकास, स्वास्थ्य पर खास जोर दिया गया है, लेकिन यह भी एक ऐसा क्षेत्र है, जिस पर पहले भी कई बार घोषणाएं की गईं। सवाल यह है कि क्या इस बार कोई ठोस नीति, स्पष्ट टाइमलाइन और पारदर्शी क्रियान्वयन का रोडमैप है, या फिर यह भी एक चुनावी जुमला बनकर रह जाएगा? पश्चिम बंगाल जैसे राज्य, जहां कभी उद्योगों की मजबूत पहचान थी, वहां आज निवेशकों का भरोसा डगमगाया हुआ नजर आता है—यह विपक्ष का लगातार आरोप रहा है। ऐसे में सिर्फ नए वादे करना काफी नहीं है, बल्कि पुराने वादों का हिसाब देना भी जरूरी है। लोकतंत्र में सरकारें सिर्फ घोषणाओं से नहीं, बल्कि अपने काम से बनती हैं। बार-बार जनता को उम्मीद दिखाकर अगर नतीजे नहीं दिए जाते, तो यह विश्वास का संकट पैदा करता है। ममता सरकार को अब यह समझना होगा कि जनता पहले से ज्यादा जागरूक है—वह सिर्फ वादे नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है। वरना यह सवाल और तेज होगा कि क्या यह राजनीति विकास की है, या सिर्फ वायदों के सहारे सत्ता में बने रहने की कोशिश?

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