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राहुल को जल्द मिल सकता है यूपीए का भी ताज…

हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष बने राहुल गांधी को अब जल्द ही कांग्रेस संसदीय दल और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) का भी नेता बनाया जा सकता है।कांग्रेस से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों ने kewalsachlive.in को बताया कि कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष को पार्टी के संविधान के अनुसार कांग्रेस संसदीय दल (सीपीपी) का नेतृत्व संभालना होता है।इस कांग्रेस ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा,’सोनिया जी ने वैसे ही पिछले कुछ समय से सीपीपी बैठक में आना छोड़ दिया था।पार्टी अध्यक्ष को ही सीपीपी प्रमुख बनाए जाने का यह नियम इंदिरा गांधी के वक्त बना था।’ऐसे में राहुल गांधी के यूपीए अध्यक्ष बनने का मतलब होगा कि अब लालू प्रसाद यादव,ममता बनर्जी,सीताराम येचुरी और शरद पवार जैसे सहयोगियों से राहुल को ही डील

करना होगा।सोनिया गांधी ने यूपीए अध्यक्ष रहते हुए इनमें से कई क्षत्रपों को अपने कुनबे में लाया था।ये सभी उम्र और तजुर्बे में राहुल गांधी से काफी वरिष्ठ है और ऐसे में वे सोनिया गांधी के साथ ज्यादा सहज महसूस करते।राहुल यहां अगर मोदी का विजय रक्ष रोकने के लिए गैर-एनडीए पार्टियों को अपने साथ लाने की कोशिश करते हैं,उनके सामने इन क्षत्रपों को संभालने की सबसे बड़ी चुनौती होगी।इनमें पहली मुश्किल शरद पवार की एनसीपी की तरफ से खड़ी होने की आशंका है।यूपीए की इस पूर्व सहयोगी पार्टी ने वैसे भी महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस से अपनी राहें अलग कर ली थी।वहीं गुजरात में एनसीपी ने अलग चुनाव लड़ा और कई सीटों पर कांग्रेस का इसका नुकसान भी झेलना पड़ा।वहीं इस बारे में पूछे जानेपर कांग्रेस अध्यक्ष के एक करीबी सहयोगी कहते हैं,राहुल इससाल अगस्त में हुए राज्यसभा चुनावों के दौरान अहमद पटेल को’धोखा’दिए जाने के कारण एनसीपी से नाराज़ थे।

गुजरात में राहुल गांधी ने बेहद सावधानी से जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपने सहयोगी चुने।ओबीसी,पाटीदार और दलित वोटरों को लुभाने के लिए उन्होंने अल्पेश ठाकोर को पार्टी में शामिल करते हुए बड़ी जिम्मेदारी दी,हार्दिक पटेल के समर्थन लिया और जिग्नेश मेवाणी का साथ देते हुए उनके लिए अपनी परंपरागत सीट रही वडगाम सीट खाली छोड़ दीगुजरात में यह रणनीति कुछ हद तक कामयाब रही,लेकिन इसने राहुल के सामने कुछ सवाल और चुनौतियां भी खड़ी कर दी।सवाल उठ रहा है कि दूसरे राज्यों के लिए राहुल क्या रणनीति अपनाएंगे ? मसलन तमिलनाडु की अगर बात करें तो क्या राहुल यहां एमके स्टालिन की डीएमके के साथ गठबंधन करेंगे।वहीं कर्नाटक में अगले साल चुनाव होने हैं।यहां कांग्रेस को अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए शहरी वोट शेयर बढ़ाना होगा।गुजरात के चुनाव नतीजों ने दिखाया है कि राहुल को अपनी रणनीति में संतुलन बनाए रखना होगा और उन्हें युवाओं और शहरी उच्च मध्यवर्ग के बीच भी पैठ बनानी होगी।एक वरिष्ठ नेता इसे लेकर कहते हैं, ‘झोला छाप राजनीति नहीं चल पाएगी।मोदी ने इसमें महारत हासिल कर ली है और राहुल को इससे कुछ अलग करना होगा।राहुल गांधी के गुजरात चुनाव के बाद पहली चुनौती तो इस आक्रमकता को बनाए रखने की होगी।कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अभी इस बात का उत्साह है कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को उन्हीं के मैदान में कड़ी टक्कर दी,लेकिन अगर अगले चुनावों में राहुल कामयाबी के परचम न लहरा पाए तो वे उनसे मुंह मोड़ भी सकते हैं।ऐसे में कांग्रेस के नए अध्यक्ष की जंग तो अभी शुरू ही है।

रिपोर्ट-दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार की रिपोर्ट 

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