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मानव व्यपार का मकड़ जाल…

दुनिया भारत को सस्ते श्रम बाजार के रूप में देखती है और भारत का श्रेष्ठी वर्ग आदिवासी, गरीब और पिछड़े इलाकों में इसी सस्ते श्रम की तलाश में रहता है।इसी सस्ते श्रम का सबसे बुरा नतीजा मानव दुर्व्यापर के रूप में लगातार सामने आ रहा है।सबसे खराब हालात छत्तीसगढ़ और झारखंड सरीखे राज्यों के हैं,जहां कि मानव तस्करी रोकने की तमाम कोशिशों के बावजूद सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा।जुलाई के जिस महीने में छत्तीसगढ़ और झारखंड राज्यों में सरकार ने आपरेशन मुस्कान चलाकर मानव व्यापार के खिलाफ जागरुकता अभियान चलाया, उसी महीने में चौंकाने वाली खबर यह आई कि मलेशिया की राजधानी में छत्तीसगढ़ राज्य के 22 

श्रमिकों को बंधक बना लिया गया।उनको वापस लाने के लिए राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार को ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा।यही नहीं इन मजदूरों को जिस एजेंट विजय बर्मन ने वहां भेजा वह अगले सप्ताह 12 और मजदूरों को सिंगापुर भेजने कि तैयारी कर रहा था।अब तक इन राज्यों से अंतरराज्यीय मानव व्यापार की खबरें आती थीं,इस खबर ने छत्तीसगढ़ से अंतरराष्टीय तस्करों के संबंधों का खुलासा भी कर दिया है।छत्तीसगढ़ राज्य को जब 15 साल पहले मप्र से अलग किया गया तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे एक अलग और विकसित राज्य बनाये जाने का सपना देखा था।दावा भी यही थी कि एक छोटे राज्य के रूप में यह तेजी से तरक्की करेगा।छत्तीसगढ़ के हिस्से में प्राकृतिक संपदा का बड़ा खजाना भी गया।छत्तीसगढ़ के जन्म के समय यहां पर कांग्रेस की सरकार बनी,लेकिन उसके बाद से लगातार रमन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार ही काबिज रही।सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सफल क्रियान्वयन कर और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपनों से भी पहले एक स्मार्ट शहर नया रायपुर के जरिए यहां पर सरकार ने अपनी छवि चमकाने की कोशिश भी की, लेकिन जिन दो मु्द्दों पर सरकार बुरी तरह असफल रही वह यहां पर लगातार बढ़ता नक्सलवाद और दूसरी मानव तस्करी।नक्सल मुद्दे पर हजारों तरीके से मंथन हो चुका है, होता रहा है, चूंकि उसके असर सीधे और साफ तौर पर रायपुर से दिल्ली तक दिखाई देते हैं,तो सरकार को चौंकन्ना होना ही होता है, लेकिन दूसरी बड़ी समस्या मानव तस्करी को वैसी गंभीरता से नहीं देखा जाता।इस समस्या से सरकार सीधे लपेटे में नहीं आती,यह 

समस्या सरकार के लिए कोई बड़ी समस्या खड़ी नहीं करती, इसलिए वह कुछ कार्यशालाओं में,कुछ निर्देशों में,एक आपरेशन में और विधानसभा सत्र के किसी एक सवाल तक ही सीमित है।सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद आपरेशन मुस्कान सरीखे आपरेशन जरूर चला लिए जाते हैं,लेकिन सवाल वही है कि केवल कुछ लोगों को रेस्क्यू कराने भर से डिजिटल इंडिया में मानव व्यापार को रोका जा सकता है।लोकसभा में देश के श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने बताया है कि इस साल 31 मार्च तक सरकार ने तीन लाख बंधुआ मजदूरों कि पहचान कर उन्हें मुक्त करवाया है।क्या यह आंकड़े इस बात के लिए मजबूर नहीं करते कि मानव दुर्व्यपार की इस समस्या को प्राथमिकता में रखा जाना चाहिए.छत्तीसगढ़ बनने के बाद से यहां पर सैकड़ों लोग नक्सली घटनाओं में लोग मारे गए या प्रभावित हुए हैं।इसके दूसरी ओर देखें तो सरकार के ही आंकड़े बताते है कि अकेले छत्तीसगढ़ में इन्ही सालों में हजारों लोग मानव व्यापार का शिकार हुए हैं।स्थानीय संसाधनों पर सदियों से जीने वाला समाज आखिर ऐसा क्या हो गया जो वह प्लेसमेंट एजेंसीज के जाल में फंस जा रहा है।यह सोचने वाली बात है और जिस पर मुख्यमंत्री स्वयं भी फख्र करते हैं कि छत्तीसगढ़ बेहद खूबसूरत राज्य है तो फिर इस राज्य के वाशिंदे कुदरती खूबसूरती छोड़कर कंक्रीट के जंगलों में क्यों जा रहे हैं।यह बात साफतौर पर दिखाई देती है​ कि मानव तस्करों का टारगेट एरिया आदिवासी इलाके हैं।रायगढ़ से लेकर जशपुर,सरगुजा ओर बस्तर के इलाकों से सीधे तौर पर किसी न किसी रूप में तस्करों का नेटवर्क सक्रिय है।बस्तर के आदिवासी अंचल के लोग जहां आंध्रप्रदेश और पड़ोसी राज्यों में काम करने जाते हैं,वहीं दूसरे इलाकों से लोग दिल्ली के जरिए जम्मू तक में भेजे जा रहे हैं।इनमें जहां कुछ लोग स्थायी रूप से कई महीनों का काम करने जाते हैं वहीं तस्करी का एक रूप मौसमी काम के जरिए भी करवाया जा रहा है।इसका एक छोटा सा उदाहरण धान रोपने का काम है।देश के किसी दूसरे इलाके में यदि आप बात करेंगे जहां कि धान रोपने का काम इंसान खुद करते हैं वहां छत्तीसगढ़ के मजदूर की बात सबसे पहले आती है।यह जाहिर सी बात है कि धान के कटोरे का आदमी इस कला में और क्षमता में भी दूसरे लोगों से बीसा साबित होता है।लेकिन उसकी यही खूबी एक किस्म के पलायन में और एक किस्म की तस्करी में तब्दील हो जाता है।वह इसलिए क्योंकि जिस बात का या जिस सौदे का उनसे वायदा किया जाता है,उससे ज्यादा उनसे काम करवाया जाता है और मजदूरी का भुगतान भी सही तरीके से नहीं होता।देश के बंधुआ उन्मूलन कानून 1976 के तहत ऐसा काम भी मानव व्यापार की श्रेणी में आ जाता है।प्रशासन इस शोषण को मानता ही नहीं,इसलिए मानव व्यापार का यह पक्ष तो दर्ज होने से ही छूट जाता है।जहां सनसनी होती है,सीधे खबर बनती है,जहां सेक्स या देह व्यापार के जरिए ट्विस्ट आता है या फिर शहर की किसी पॉश कॉलोनी में कोई मजदूर, कोई बाई,कोई लड़की की सूचना मिलती है,तब एक्शन होता है।यह एक्शन ठीक वैसा ही है जिस तरह किसी दूसरी घटना का।लेकिन जब कोई चीज एक षडयंत्र के तहत दीर्घावधि में चलती है तब उस षडयंत्र की काट को भी उसी अनुपात में नहीं चलाया जा रहा हो तो समस्या तो बरकरार रहेगी ही।मानव व्यापार के मामले में भी एक सीधा अंतर इसी बिंदु पर दिखाई देता है,यह ऐसी समस्या है जिसका हल केवल एक महीने के आपरेशन में नहीं है।

रिपोर्ट-धर्मेन्द्र सिंह 

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