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पिछले 6 चुनावों के बाद पहली बार कांग्रेस जमीन पर लड़ती दिखाई दे रही थी….

कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए विधानसभा चुनाव के नतीजे अच्छे रहे।गुजरात में कांग्रेस की संतुष्टि इस बात को लेकर है कि पिछले 6 चुनावों के बाद पहली बार कांग्रेस जमीन पर लड़ती दिखाई दे रही थी।कांग्रेस के नए राजनीतिक समीकरण के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किला बचाने के लिए धुआंधार रैलिया करनी पड़ी।परिणाम बीजेपी के पक्ष में रहा,लेकिन राहुल गांधी के लिए कई मायनों में ये नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले है।बीजेपी के मुकाबले गुजरात में कांग्रेस का संगठन कमज़ोर था।राहुल गांधी ने पार्टी के नेताओं की मदद से कांग्रेस को मुकाबले में लाकर खड़ा कर दिया।कांग्रेस के सांसद और यूथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राजीव सातव कहते हैं,’अगर राहुल गांधी पहले से प्रचार की शुरुआत न करते तो नतीजे और खराब हो सकते थे।राहुल गांधी इस चुनाव में फाइटर की तरह उभर कर निकले और नतीजों की परवाह किए बिना काम करते रहे।कांग्रेस की विरोधी शिवसेना ने भी उनकी तारीफ की है।कांग्रेस पार्टी के बाहर कार्यकर्ताओं का जोश बता रहा था कि राहुल गांधी अध्यक्ष बनने के बाद पहले इम्तेहान में पास हो गए हैं।हालांकि राहुल गांधी को डिस्टिन्क्शन की उम्मीद थी, जो नहीं मिल पाया। कांग्रेस के कई नेताओं ने कहा कि राहुल गांधी ने गुजरातियों का दिल जीता है।

राहुल गांधी ने भी कहा कि वह गुजरात और हिमाचल की जनता को धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने उनके प्रति इतना प्यार दिखाया है। आप गौर करे की हिमाचल प्रदेश की हार से कांग्रेस की सत्ता सिर्फ पांच राज्यों मे सिमट गई है, लेकिन कार्यकर्ता निराश नहीं हैं। उनमें राहुल गांधी को लेकर जो संशय था वो कुछ हद तक दूर हुआ है, क्योंकि गुजरात चुनाव में कांग्रेस के नए अध्यक्ष के लिए एक लिट्मस टेस्ट भी था। कार्यकर्ता कह रहे कि जिस तरह राहुल गांधी ने लीड किया, उससे ये आशा जगी कि 2019 में कांग्रेस की स्थिति राहुल गांधी की अगुवाई में बेहतर हो सकती है। राहुल गांधी गुजरात के चुनाव में नए तेवर के साथ दिखे, जो पार्टी के लिए फायदेमंद रहा। वह मैदान भले नहीं मार पाए,लेकिन पार्टी के भीतर खुद को साबित करने में कामयाब रहे। कांग्रेस के युवा नेता और गुजरात चुनाव में पार्टी का कामकाज देख रहे आसिफ जाह का भी कहना है कि राहुल गांधी जनता से कनेक्ट करने में कामयाब रहे।राहुल गांधी ने बेरोजगारी, जीएसटी,नोटबंदी और किसानों का मुद्दा उठाया,जिससे जनता का भरोसा राहुल गांधी पर बढ़ा है।

 

अहमदाबाद में कांग्रेस का काम कर रहे पार्टी के एक और नेता परवेज़ आलम कहते हैं कि बतौर कांग्रेसी उन्हें पहले ऐसा लगता था कि मोदी का मुकाबला करना कांग्रेस के वश में नहीं,लेकिन इन नतीजों से ऐसा लगा है कि राहुल गांधी की अगुवाई में बीजेपी को मात दिया जा सकता है।कांग्रेस के भीतर और बाहर भी राहुल गांधी को लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे थे।खासकर निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित होने पर शहज़ाद पूनावाला ने खुलेआम सवाल उठाए।राहुल गांधी की राजनीतिक समझ पर अक्सर लोग उंगली उठाते रहे हैं।गुजरात के नतीजों ने राहुल गांधी को इन सब के बीच मज़बूत किया है।अगर नतीजे एकतरफा बीजेपी के पक्ष में जाता तो राहुल गांधी पर सवाल उठना लाज़िमी था।गुजरात में प्रचार का दारमोदार राहुल पर ही था।चुनाव के दौरान भी सेंटर स्टेज पर राहुल गांधी ही थे।पार्टी के प्रदेश के नेता राहुल गांधी के साथ दिखे ज़रूर, लेकिन लाइमलाइट में राहुल ही रहे।बीजेपी ने भी राहुल गांधी को ही टारगेट किया,चाहे वो सोमनाथ का मसला हो या फिर आरक्षण को लेकर पाटीदार अनामत आंदोलन के मसौदे की बात रही हो।

गुजरात चुनाव कांग्रेस के लिए संजीवनी तो नहीं बन पाए,लेकिन पार्टी को निराशा से बाहर लाने में मददगार ज़रूर हुए हैं।हालांकि आगे राहुल गांधी की चुनौती आसान नहीं रहने वाली।सामने नरेंद्र मोदी अमित शाह की जोड़ी है,जिसने विपरीत परिस्थिति में बीजेपी को गुजरात में जीत दिला दी है।दोनों ही नेता 24 घंटे राजनीति के बारे में सोचते हैं,सटीक फैसले लेते हैं।चाहे यूपी के चुनाव रहे हों,महाराष्ट्र में शिवसेना से अलग होकर विधानसभा और नगर निगम चुनाव में जाने का फैसला हो या फिर दिल्ली में नगर निगम चुनाव में सभी मौजूदा पार्षदों का टिकट काटने का फैसला हो,ये सभी फैसले चुनाव की कसौटी पर खरे साबित हुए हैं।राहुल गांधी को इनकी सूझबूझ और एनर्जी लेवल की बराबरी करनी पड़ेगी।2014 के आम चुनाव के बाद बीजेपी ने कई चुनाव जीते।बीजेपी के संगठन में भी कई बदलाव देखने को मिले,लेकिन कांग्रेस में अब तक मामूली फेरबदल ही हो पाया है।कांग्रेस के अध्यक्ष ने कहा है कि कांग्रेस में जल्दी ही बदलाव होगा और नए लोगों को पार्टी में काम करने का मौका मिलेगा।राहुल गांधी को 2018 की शुरुआत में ही फेरबदल करना पड़ेगा,क्योंकि 2019 के चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं बचा है।इस बीच चार बड़े राज्यों कर्नाटक,राजस्थान,मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव हैं।कांग्रेस के पास नेताओं का अभाव नहीं है।

राजस्थान को छोड़ दें तो बाकी दोनों राज्यों में बीजेपी की सत्ता को 15 साल हो जाएंगे।कांग्रेस में नया उत्साह बढ़ाने के लिए राहुल गांधी को इन चार राज्यों में तो ज़ोर लगाना ही पड़ेगा।साथ ही साथ लोकसभा चुनाव की तैयारी भी करनी पड़ेगी।नया गठबंधन भी बनाने की ज़िम्मेदारी बहुत हद तक राहुल के कंधों पर रहेगी।हालांकि इस मामले में सोनिया गांधी राहुल गांधी का मार्गदर्शन करती रहेंगी।राहुल गांधी को बीजेपी के चाणक्य का मुकाबला करने के लिए सीनियर नेताओं का सहयोग लेना पड़ सकता है।एनसीपी के नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा भी कि ‘कांग्रेस अगर उनके साथ होती तो नतीजे और अच्छे होते।ज़ाहिर है ये प्रफुल्ल का तंज़ था,राहुल गांधी के लिए शरद पवार और लालू प्रसाद जैसे सहयोगी नेताओं को डील करना भी चैलेंज है।ये लोग ऐन मौके पर ऐसे फैसले ले सकते हैं,जो कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं।लालू ने साफ कहा है कि ये अभी तय नहीं है कि 2019 में चुनाव राहुल की अगुवाई में लड़ा जाएगा।राहुल गांधी को इन नेताओं को साथ लेकर चलने का सबक भी यूपीए 1-2 के कांग्रेस के सीनियर नेताओं के साथ बैठकर समझना पड़ेगा।

रिपोर्ट-वरिष्ठ पत्रकार की रिपोर्ट दिल्ली से 

राहुल को जल्द मिल सकता है यूपीए का भी ताज…

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